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जुङें,जोङें और जोङते चलें

Posted On: 21 Dec, 2012 Others में

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कल सुबह की बात है ,बालकनी में खङी हो कॉफी की चुस्कियां ले ही रही थी ,तभी नजर सामने जा रही पङोसन की कामवाली पर पङी ,जिसका पति रोज उसे अपने रिक्शे से छोङने आया करता है,लाज की गठरी बनी पत्नी जब रिक्शे से उतरती तो पति का सीना गर्व से फूल जाता और अंदर जाती पत्नी को देख मुस्कुरा देता,जवाब में पत्नी ईधर-उधर देख हाथ हिला देती…..,आप ये ना समझें कि मुझे और कोई काम नहीं ,बस छिछोरों की तरह दुसरों की ताकाताकी किया करती हुं.दरअसल इन क्रियाकलापों से रोज ही मुहल्ले का कोई ना कोई सदस्य दो-चार अवश्य होता है….,और ये चर्चा का विषय इसलिए बनता है कि हर दो चार दिन बाद उक्तजोङे में घमासान युद्ध हुआ करता है,बात मारमपीटी से लेकर खुनखराबे तक पहुंच जाती है,पर जहां अगला धरती पर पङता है(पति या पत्नी),दुसरा उसकी सेवा में यूं लग जाता है मानो उसे उस स्थिति में किसी और ने पहुंचाया हो,क्षण भर पहले का गर्जन और किटकिटाहट करुण विलाप में बदल जाता है और बीचबचाव के लिए आए लोग सहानुभूति जता जता कर वापस हो जाते है,चार दिन बाद वही कहानी रिप्ले हो जाती है ,एक दिन उसके सूजे चेहरे को देखकर द्रवित होकर मैने कहा- ललन की मां कितना बेदर्द है तुम्हारा पति,कोई भला पत्नी को इस तरह जानवरों सा मारता है….,इसपर उसका जवाब सुनिए- ना दीदी ऐसे ना बोलो पति तो भगवान शंकर का रुप है,गुस्साना-मारना-पीटना अरे ये मर्द ना करे तो लोग उसे चूङियां ना पहना दें,ये सबतो औरतों का भाग-सोहाग (भाग्य-सुहाग) है…..अदभुत परिभाषा दी उसने मर्द की,उसकी कसौटी पर परखा तो अपने घर में तो कोई पुरूष ही नहीं नजर आया मुझे शर्म से भर गई मैं तो………पर उस औरत ने जो कहा उसे नकारा भी तो नहीं जा सकता,स्त्री-पुरूष के श्रेष्ठता की लङाई में निश्चित रूप से किसी एक को विजेता घोषित नहीं किया जा सकता,पलङा संतुलित भी होता है तो ठहराव आने की संभावना है,तो जरूरी है कम से कम उन्नीस-बीस का भी अंतर,… मुझे पता है उस कामवाली का विवाह कभी नहीं टूटेगा क्योंकि वो खुद को पति से कमतर मान चूकी है….इसी तरह मेरे पास अक्सर एक स्त्री आया करती है जिसकी शादी एक ऐसे पुरूष से करा दी गई थी जो स्त्री भार तो छोङिए खुद के दैनिक क्रियाकलापों में भी असमर्थ था….,दाद देनी होगी उस स्त्री की जिसने ना केवल जीवनपर्यन्त उसका शारीरिक,आर्थिक व मानसिक भार उठाया बल्कि खुद को भी सहेजे रख एक मिसाल कायम किया…जिसकी वजह से आज उसकी ठसक देखते बनती है. ….यही नहीं अभी जो मेरी कामवाली है उसका पति घर पर रहकर अपने चार बच्चों की देखभाल करता है और वो चौके-बरतन का काम कर गृहस्थी चलाती है.
कहने का मतलब कि वही जहां उपरोक्त उदाहरण स्त्री-पुरूष के आपसी समझ-सामंजस्य को बल देते है वही कई ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते है जहां विवाह को तलवार की धार पर रख दिया जाता है,कहना पङता है, आर्थिक स्वालंब ने कुछ स्त्रियों को इतना उच्छंश्रृंखल बना दिया है कि वो अपना आशियां समझौतों की नीव पर बसाना ही नहीं चाहती दोष उसका भी नहीं ,उसने कभी सहनशीलता के उस कसौटी पर खरा उतर कर दिखाया है जो आज उसका पैमाना बन चुके है… नए बदलावों ने उसकी दिशा और दशा ही नही बदली उसकी नारी सुलभ सोच को भी बदल दिया…उसे उङने को पंख मिले पर वो ये क्यों भूल गई कि इन्ही पंखों के अंदर मुश्किलों में उसे अपनों को समेट लेना भी है, मुझे लगता है कि उपरोक्त स्त्रियां और इनके जैसे अनगिनत लोग अनपढ और अल्पबुद्धि होते हुए भी जानतें है कि घर बचाए और बनाए रखने के क्या क्या उपाय है और तथाकथित पढे-लिखे और समझदार लोग समझौते-समझदारी-अहं का त्याग जैसे मुलमत्रों को भूलकर अपनी और जीवनसाथी की नही दो परिवारों की खुशियों मे घुन लगा देते है…….,क्या जोङे रखना या जुङकर रहना इतना मुश्किल है मुझे तो नही लगता……,एक इंसान अपने कार्यक्षेत्र में ,समाज में ,मित्रमंडली में,परिवार में सामंजस्य स्थापित कर सकता है पर एक ऐसे इंसान जिसने उसका साथ निभाने की कसमें खाई है,जो हर वक्त उसके पास उसके साथ है उससे निभाना इतना मुश्किल कैसे हो सकता है कि बात टूटकर ही खतम होती है… और क्या टूटने के बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है क्या फिर से वो खुशी जिंदगी में वापस आ पाती है,मुझे तो लगता है कभी भी नहीं फिर क्यों ऐसा कर बैठता है आदमी…….. मेरी समझ से सबसे बङी वजह अहं दुसरी घटती सहनशीलता….एक सीधा सादा खुशनूमा जीवन जीना हमारा हक भी है और उस खुशी को बरकरार रखना कर्तव्य भी…उसके लिए अहं-ब्रह्मा-अस्मि के जाल से बाहर आएं,थोङा दूसरे के अनुरूप ढलें,दूसरा भी खुद-ब-खुद आपके अनुसार ढलने की कोशिश करेगा…,आखिर सामने वाला भी तो इंसान है …गल्तियां ऐसी ही करो जो तुम्हे सीखने का मौका दें ऐसी गल्तियां मत करो जो तुम्हे दुसरों के लिए सीखने का सबक बना दें..और दुसरी बात, कभी सुना है कि टूटा और ऊपर चला गया,टूटने का अंजाम नीचे गिरना ही होता है……तो क्यों वो लङाई लङे जिसे जीतकर भी हार हमारी ही हो, ……..
इसलिए जुङे,जोङें और जोङते चले के संदेश के साथ नववर्ष की अग्रिम बधाईयां ,आप सबों के लिए वर्ष विशिष्ट साबित हो……..

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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
February 27, 2013

सबसे बङी वजह अहं दुसरी घटती सहनशीलता….एक सीधा सादा खुशनूमा जीवन जीना हमारा हक भी है और उस खुशी को बरकरार रखना कर्तव्य भी…उसके लिए अहं-ब्रह्मा-अस्मि के जाल से बाहर आएं,थोङा दूसरे के अनुरूप ढलें,दूसरा भी खुद-ब-खुद आपके अनुसार ढलने की कोशिश करेगा…,आखिर सामने वाला भी तो इंसान है …गल्तियां ऐसी ही करो जो तुम्हे सीखने का मौका दें ऐसी गल्तियां मत करो जो तुम्हे दुसरों के लिए सीखने का सबक बना दें..और दुसरी बात, कभी सुना है कि टूटा और ऊपर चला गया,टूटने का अंजाम नीचे गिरना ही होता है……तो क्यों वो लङाई लङे जिसे जीतकर भी हार हमारी ही हो, ……..पूर्णतया सहमत !

alkargupta1 के द्वारा
December 30, 2012

मीनू जी , अति सुन्दर सन्देश देता हुआ अर्थपूर्ण आलेख की प्रस्तुति केलिए बधाई

    minujha के द्वारा
    December 30, 2012

    आदरणीय अलका जी, हार्दिक आभार.

December 29, 2012

सादर प्रणाम दी! संदीप जी का आलेख पढ़ने के लिए हार्दिक आभार……………………यह पहली बार नहीं हुआ कि मैं किसी कि पोस्ट से कुछ ब्लोगरों को अवगत कराया हुआ………..इसके अलावा भी ऐसे कई ब्लोगरों के आलेख कुछ अलग होने पर सबको अवगत कराता आया हुआ………….यक़ीनन आप एक बहुत अच्छी इन्सान है और मेरे लिए सम्मानीय भी……………..परन्तु इस पुरे मानव जाति के लिए यह अभिशाप है कि आप जैसे लोगों के चुपी साधने या फिर जो लोग दिखाना चाहते हैं उसे देखने के कारण ही पूरा विश्व नर्क हो गया है…….. यह तो मैं जनता हूँ कि आप उनमे से नहीं जो चुपचाप यह सब देखते रहे……….पर यक़ीनन आप उनमे से हैं जो वहीँ देख पाते हैं जिसे कुछ लोग दिखाना चाहते हैं……….दी आप किसी भी घटना या विचार को अपने आखों से देखने कि कोशिश करिए………….वो भी समय और सीमा से मुक्त होकर…………विनम्र निवेदन के साथ…………..आपका अनुज……

    minujha के द्वारा
    December 30, 2012

    मेरे भाई,मैं आपकी बातों का सम्मान करती हुं,और यकीनन मेरी उम्र अब उतनी छोटी नहीं है,जहां मुझे कोई गलत को सही कहने कह दे तो मैं सहमत हो जाउं,मेरी अंदर एक अपनी सोच भी है और उसे दिशा देने की बौद्धिक क्षमता भी,चलिए आपकी बात मान भी लेते है कि संदीप जी सच देखते और सोचते है,मैं ये भी कहना चाहुंगी कि वो बहुत अच्छा लिखते भी है…हो सकता है उन्हे बहुत लोगों की सोच या विचार पसंद ना आते हों…पर मेरे भाई, विरोध करने का भी एक तरीका होता है ,अपने से बङी उम्र के लोगो के प्रति अभद्र भाषा या उन्हें नीचा दिखाकर यदि आप अपने आप को विचारवान कहते है तो मैं इससे ना सहमत थी ना होना चाहुंगी…ये मंच सबका है…और हरेक को अपने विचारप्रकट करने का अधिकार है उसमें किसी का हस्तक्षेप करना मुनासिब नहीं….आप किसी को विशेष  बनाने के लिए किसी का अनादर तो नहीं कर सकते…ये मेरी अपनी सोच है आप इसे अभिशाप कहें या वरदान…आपका मैं सम्मान करती हुं इसलिए आपसे इतना कुछ कह पाई,संदीप जी के ब्लॉग पर भी गई थी पर यदि वहॉं जवाब में कुछ लिखा तो.. अपनी फजीहत करवाना ही होगा…खैर आपने लायक समझा खुशी हुई…आभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 1, 2013

    मीनू जी , सादर !….. वैसे तो आप ने पर्याप्त कह दिया पर आप से एक बार पुनः संदीप जी के पोस्ट पर जाने का आग्रह इस लिए कर रहा हूँ कि वहां मैं ने पुनः कुछ कहा है | कृपया देखें ! कुछ लोग प्रमाद बस बहुत कुछ कह जाते हैं छद्म वेश धारण कर !

Santosh Kumar के द्वारा
December 27, 2012

आदरणीया ,..सादर प्रणाम बहुत अच्छी पोस्ट से आपने भारतीय संस्कारों को उभार है ,.उपभोक्तावाद के भयानक दौर में भी हमारे रिश्ते अधिकांशतः मजबूत हैं ,..यह हमारी संस्कृति का प्रबलतम पक्ष है ,….अति सुन्दर सन्देश और शुभकामनाओं के लिए कोटिशः आभार ,…..सादर हार्दिक शुभकामनाएं

    minujha के द्वारा
    December 30, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका पोस्ट को दिल से सराहने के लिए संतोष भाई.

yogi sarswat के द्वारा
December 27, 2012

ये जीवन का सबसे सफल मन्त्र है की आप स्वयं भी खुश रहे और दूसरों को भी खुश रहने का मौका दें और ये तभी संभव है जब मन में किसी के प्रति द्वेष न हो ! लेकिन द्वेष रखना शायद मानव की प्रवृति है ऐसे में ये कहना ही उचित है की ज्यादा द्वेष न हो यानी की बदले की भावना न हो ! नव वर्ष की बेल में आपने आपस के जोड़ और जुड़ाव को उदहारण सहित प्रस्तुत किया अच्छा लगा !

    minujha के द्वारा
    December 27, 2012

    आपके विस्तृत अवलोकन व सहमति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद योगी जी,

seemakanwal के द्वारा
December 26, 2012

विचारणीय लेख साधुवाद

    minujha के द्वारा
    December 27, 2012

    हार्दिक धन्यवाद सीमा जी

December 25, 2012

प्रणाम दी! बहुत ही सुन्दर और सार्थक सन्देश देता हुआ आलेख………………………………..हार्दिक आभार……………….कृपया इसे भी पढ़ना चाहें………………. http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2012/12/24/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/

    minujha के द्वारा
    December 26, 2012

    बहुत सारा धन्यवाद भाई…अवश्य पढूंगी

vinitashukla के द्वारा
December 24, 2012

सच कहा आपने. पति पत्नी के आपसी सामंजस्य हेतु, अहम का त्याग और सहनशीलता दोनों बहुत जरूरी हैं. सुन्दर आलेख पर बधाई एवं साधुवाद.

    minujha के द्वारा
    December 25, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद विनीता जी

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 24, 2012

अब्द नूतन सुखद औ’ स्वर्णिम बने, कामना पल-पल सदा मधुरिम बने ! भावना का उदधि इतना बह चले , प्रीत हर रक्ताभ सा अरुणिम बने !!…… प्रेरक पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई ! पुनश्च !!

    minujha के द्वारा
    December 25, 2012

    आचार्य जी आपके शब्दों को लिए आपका दिल से आभार 

rekhafbd के द्वारा
December 24, 2012

मीनू जी मेरी समझ से सबसे बङी वजह अहं दुसरी घटती सहनशीलता….एक सीधा सादा खुशनूमा जीवन जीना हमारा हक भी है और उस खुशी को बरकरार रखना कर्तव्य भी…उसके लिए अहं-ब्रह्मा-अस्मि के जाल से बाहर आएं,थोङा दूसरे के अनुरूप ढलें,दूसरा भी खुद-ब-खुद आपके अनुसार ढलने की कोशिश करेगा…,आखिर सामने वाला भी तो इंसान है, आपसे पूर्णतया सहमत ,बढ़िया आलेख ,बधाई

    minujha के द्वारा
    December 25, 2012

    रेखा जी बहुत बहुत शुक्रिया

jlsingh के द्वारा
December 24, 2012

आदरणीया मीनू जी, सादर अभिवादन! अब मैं भी अपने गाँव की सच्ची घटना सुनाता हूँ! – मेरे गाँव में पड़ोस में ही एक पति अपनी पत्नी को वैसी ही बेरहमी से पीटता था – वह स्त्री बाद में बैठकर रोती भी थी. एक बार उसका पति बहुत गुस्से में था और लोहे के कलछुल (दाल चलाने वाला बड़ा चम्मच) से अपनी पत्नी को मार बैठा और खून निकल आया- उस दिन बेचारी बहुत देर तक दर्द से कराहती रही. मेरी माँ से बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने(मेरी माँ ने) गाँव के ही डॉ. को बुलाकर उसकी मरहम-पट्टी करवाई सुई-दवाई दिलवाई … मेरी माँ ने उसके आदमी को उस दिन खूब ‘फटकार’ लगाई … वह भी अफ़सोस करने लगा … “क्या करें चाची, गुस्सा दिला देती है, … यह चुप नहीं रहती है” … सिलसिला आगे भी चलता रहा, पर थोड़ी कमी आई. उस औरत ने फिर भी अपने पति की शिकायत किसी से नहीं की … यही कहती- “मर्द है तो गुस्सा तो करेगा ही!”…..कुछ साल पहले उस औरत के पति का देहांत हो गया (ज्यादा शराब वजह रही होगी). उस औरत(रिश्ते में भाभी) ने मुझसे कहा- “बेटा तो है जवाहर बाबु, पर ‘अपना आदमी’ (पति) नहीं रहने से सब सुख बेकार है!” … मैंने भी उस भाभी तुल्य स्त्री को मन ही मन प्रणाम किया!…ऐसी होती है भारतीय नारी! ….यह भी सहनशीलता की मिशाल है! मीनू जी, आपके विचारों का मैं पहले भी आदर करता रहा हूँ, आगे भी करता रहूँगा!

    minujha के द्वारा
    December 25, 2012

    आदरणीय जवाहर जी बात से घटना का हवाला दे कर सहमत होने के लिए आपका .धन्यवाद…..साथ ही इतना मान देने के लिए  भी  हार्दिक आभार

Sushma Gupta के द्वारा
December 22, 2012

प्रिय मीनू जी, जुड़े , जोड़ें और जोड़तें चलें शीर्षक ही आपके आलेख पर आपसी सामंजस की वेजोड़ मौहर लगा देता है ,जो जीवन की सकारात्मकता की और प्रेरित करता है …आपको भी नव बर्ष की शुभकामनाएं एवं ब्लॉग पर स्वागत…

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    सुषमा जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद आलेख के उद्देश्य को समझने और सराहने  के लिए…शुक्रिया

akraktale के द्वारा
December 22, 2012

मीनू जी सादर, बहुत सुन्दर सीख देता आलेख. जीवन है कई रंग दिखाता है.सच है गलतियाँ सबक दे वहीँ तक ठीक हैं उस सबक से जींदगी में खुशियों के रंग भरो खुद जियो औरों को जीने दो,जुडो जोड़ो और जोडते चलो. सुन्दर शिक्षाप्रद आलेख बधाई स्वीकारें.

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    आपने मुक्तकंठ से सराहा अत्यधिक खुशी हुई बहुत बहुत आभार आपका रक्ताले जी

nishamittal के द्वारा
December 21, 2012

मी नु जी ,शायद यही समर्पण और प्रेम भाव है जिस कारण हमारे देश में तलाक दुनिया में सबसे कम है,परन्तु मैं हिंसा से सहमत नहीं हूँ

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    हिंसा का पक्षधर हममें से शायद कोई नही होगा निशा जी पर कम पढे लिखे लोग अक्सर ऐसी हरकत करते है,और अपने आप को गलत मानने को भी तैयार नहीं होते ये दुख की बात है…….आपका बहुत बहुत आभार

ajaykr के द्वारा
December 21, 2012

मीनू दीदी, सादर प्रणाम मैंने सुना हैं कि प्रेम व आपसी छोटे मोटे झगडे एक दूसरे के पूरक हैं ,और झगड़े से प्यार बढ़ता हैं [सिर्फ सुना हैं अनुभव नही हैं ]…अक्सर पति बहुत अहंकारी हों जाते हैं और पत्नी कि बात नही सुनते ,हमेशा कमतर आंकते हैं ,बाद में पत्नी ही उनको विषम परिस्थितियो से उबारती भी हैं |

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    आपने सही देखा और सुना है भाई,पर हमेशा पुरुष या हमेशा स्त्री ही दोषी नही होते,कई बार दोनों सही होते है पर हालात ही गलत हो जाते है,इसलिए तो कहा-सुनो,समझो फिर करो,आपका बहुत धन्यवाद ब्लॉग पर पधारने के लिए

yamunapathak के द्वारा
December 21, 2012

प्रिय मीनू मंच पर कई दिनों के बाद पुनः तुम्हे पा कर सुखद लगा.तुम्हारे लोग का विषय बहुत ही प्रासंगिक है.स्त्री-पुरुष के apne daayare hain aur swabhaav gat ek maulik baat yah है ki पुरुष jeetane के लिए ek ही raah janataa है sangharsh स्त्री jeetane kaa ek ही raasta जानती है समर्पण पुरुष जहां मैं से ग्रसित है स्त्री के लिए मैं से कोई सरोकार नहीं वन मेरा के भाव से ही संतुष्ट रहती है.मेरा पति,मेरा बच्चा शेष पुनः sabhar

    yamunapathak के द्वारा
    December 21, 2012

    प्रिय मीनू कृपया ‘लोग’ को ब्लॉग और ‘वन’ को वह पढ़ें गलती के लिए क्षमा चाहती हूँ.

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    आपने समझा,अपने विचार दिए और सराहा,इन सबके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 21, 2012

गुस्साना-मारना-पीटना अरे ये मर्द ना करे तो लोग उसे चूङियां ना पहना दें,ये सबतो औरतों का भाग-सोहाग (भाग्य-सुहाग) है… स्नेही भतीजी जी,  जीती रहिये जोड़ते रहिये लिखते रहिये. आपको भी नव वर्ष की सपरिवार बधाई. शुभाशीष.

    minujha के द्वारा
    December 23, 2012

    धन्यवाद चाचा जी आपका आशीर्वाद सर-आंखों पर,आभार


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