मेरी लेखनी :मेरा परिचय

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एक पाती आस भरी

Posted On: 12 Jun, 2012 Others में

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मेरे प्रिय……
समझ नहीं आता शुरूआत किस संबोधन से करुं,क्योंकि ये बहुतों को समर्पित एक लंबी सूची है…,जिसे एक साथ समेटना मुश्किल जान पङता है,हां आपसे अनुरोध है कि अगर आपको कोई संबोधन उचित लगे तो अवश्य अवगत कराएं,शुक्रगुजार रहुंगी
तो……..,सात फेरों और वचनों ने खुद से जुङी अनगिनत जिम्मेदारियों को मेरे आंचल में बांधने के बाद ही अपने घर की दहलीज लांघ कर अंदर आने की अनुमति दी थी मुझे.कच्ची उमर,अपरिपक्व अनुभव और चंचलता मानो बचपने की सखियों की ही तरह डोली के पीछे दूर तलक भागते भागते छूट गईं,नए चेहरे ,नए रिश्ते और एक बिल्कुल नई नवेली जिंदगी बिल्कुल मेरे लाल जोङों की तरह..,घर की चाभी तो मिली पर मैं समझ ना पाई कि कब उसने मेरी स्वतंत्रता पर ताले जङ दिए,और पहले दिन गृहस्थी के जुए को अपना कंधा क्या दिया वो कंधा उसी का होकर रह गया,फिर समय के साथ साथ सास-श्वसूर की सेवा,ननद-देवरों की जिम्मेदारियां,पति के प्रति कर्तव्यों और बच्चों की ममता ने हर कदम एक नए लक्ष्य का भान कराया..,जिसके पीछे मैं तन-मन से समर्पित होती रही और पूरा कर अपनी पीठ थपथपाती रही,मेरी सुबह परिवार के लिए ही होती और रात भी अगले दिन परिवार के कार्यक्रमों की रुपरेखा बनाती जाने कब नींद को नसीब होती,मेरा आदि मेरा घर- मेरा अंत भी मेरा घर,हर सांस ,हर क्षण बस अपनों को दिया बस उन्ही की खातिर जी……….,अपनी पहचान बनाने की अभिलाषा,अपने नागरिक होने के कर्तव्य ,अपने विकास के सपने और अपनी शिक्षा से जुङी महत्वाकांक्षाएं सबको अपने ही घर के किसी तख्ते पर सहेजकर पति,बच्चों और परिवार को सर्वस्व माना और आंख मूंदने तक मानने की कसम खाई है……….आखिर मेरा श्रम मेरे परिवार के काम आ रहा है,उनके आराम-चैन और खुशियों की सूत्रधार हुं मैं. और भला मैं उनके लिए ना सोचुंगी तो कौन सोचेगा..,मैं अपने आप से बहुत खुश हुं ..पर शायद मेरा अस्तित्व-मेरी पहचान से मेरे अपने खुश नही……………….
मैनें देखा है मेरी सासूमां की आँखो में मेरी कमाऊ देवरानी की अपनी सखियों से चर्चा करनें में जो गर्व का भाव कौंधता है वो मैने अपने लिए कभी नही पाया,ननद-देवर अपने शैक्षिक समस्याओं को मेरी बजाय मेरी सहेली जिसकी शिक्षा मेरे ही समकक्ष है पर वो नौकरीशुदा है ,से सुलझाते है..,उसकी इज्जत मुझसे ज्यादा करते है.पतिदेव मित्रों की कामकाजी पत्नियों का हवाला दे आए दिन अपने घर उन्हे आमंत्रित जरूर करते है पर मेरे अनमोल श्रम के पारिश्रमिक की गणना कभी नही की उन्होने, जरूरत ही क्या थी ? और बच्चे उन्हे तो अपने दोस्तों को बताने तक में झिझक होती है कि उनकी मां नौकरी नही करती…………..,यक्ष प्रश्न खङा है मेरे आगे क्या मेरा श्रम बेगारों की श्रेणी मे आता है??,क्या मेरे त्याग का मूल्य ढेला भर भी नही??क्या मैने अपने सपनों के साथ साथ अपनी पहचान भी खो दी है?? ,जिससे भले मुझे कोई गुरेज नही पर मेरे अपने ही कतराने लगे है…. क्या मेरी तरह अपने उत्तरदायित्व के पीछे अपनी सारी जिंदगी बीता देने वाली औरत का महत्व बस सबकी जरुरतों को वक्त पर पूरा कर देना ही रह गया है,…….क्या कहुं मानव वर्ग भले मेरी कृतज्ञता में सर ना नवाए,पर मेरी सार्थकता को तो ना नकारे….,मेरे श्रम का प्रतिदान ना देना हो ना दे पर भरपुर इज्जत तो दे,मेरी बङाई के कशीदे ना पढे पर मेरे महत्व को बस अपनी एक प्रशंसा भरी नजर ही देदे ,इससे ज्यादा की ख्वाहिश तो की भी नही कभी मैने….,पर जब सबने मेरे अस्तित्व को झुठलाना शुरू कर दिया तो कही मैं खुद का आत्मसम्मान ना खो दूं इस खातिर अपनी भावनाओं को शब्द दे दिया, यही नही परिवार,समाज ही नही सरकार तक ने मुझे भिखारियों और वेश्याओं की श्रेणी में रखा था जातिगत जनगणना के आधार पर..,कारण ये तीनो अपने पालन-पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर रहते है ,जिसे भले बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने एतराज जता कर रोका,पर प्रश्न है कि क्या पहचान है मेरी………,और शायद तब तक तरसूंगी मैं अपने स्व को पाने के लिए जबतक मेरा जमीर मेरी खुद्दारी मुझे वापस नही दी जाती अपनों के हाथों, मेरे परिश्रम को सम्मान नही मिल जाता, मेरा संघर्ष जारी रहेगा-दोतरफा संघर्ष एक खुद से और एक अपने अपनों से ,खुद से जीत गई तो अपनी इन्ही परिस्थितियों में संतुष्ट होना सीख जाउंगी और अगर अपनों ने सबकुछ दे दिया तो जिंदगी से कोई शिकायत कभी भी ना होगी और शायद बिना किसी भावनात्मक उथलपुथल के चैन भरी अंतिम सांसे ले पाउं ,जीवन सार्थक हो जाए मेरा……………………………………..
एक गृहिणी……..

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73 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
May 20, 2013

एक नारी ज का पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित हो जाता है फिर भी क्या पहचान है मेरी………,और शायद तब तक तरसूंगी मैं अपने स्व को पाने के लिए जबतक मेरा जमीर मेरी खुद्दारी मुझे वापस नही दी जाती अपनों के हाथों, मेरे परिश्रम को सम्मान नही मिल जाता, मेरा संघर्ष जारी रहेगा-दोतरफा संघर्ष जीवन दो तरफ़ा नही हज़ार तरफा संघर्ष से गुजरता है ………मेरा नारी को नमन !

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी … बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!! शुभकामनायें. .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

sumandubey के द्वारा
August 5, 2012

मीनू जी नमस्कार , आपने जो लेखनी के माध्यम से व्यक्त किया वह शायद बदले हुए वक्त में प्रत्येक उस ग्रहणी. की आत्मा की आवाज है जहा परिवार में रोज उसे इस एहसास से दो चार होना पड़ता है.

yamunapathak के द्वारा
July 31, 2012

प्रिय मीनू, लगभग डेढ़ महीने हो गए तुम्हारे लेख नहीं आ रहे क्या बात है? plz come back wid ur evergreen blog yamuna

seemakanwal के द्वारा
July 29, 2012

मीनू जी सर्वप्रथम विलम्ब से आने के लिए माफ़ी .आप की ये चिठ्ठी बहुत लोगों के दिल की आवाज़ है . हार्दिक आभार .

pritish1 के द्वारा
July 29, 2012

भावपूर्ण अभिव्यक्ति……..अच्छी रचना…….. प्रीतीश

ajaykr के द्वारा
July 10, 2012

meenu ji,सादर प्रणाम आपका लेख बहुत अच्छा और सार्थक लगा ….

    minujha के द्वारा
    July 11, 2012

    धन्यवाद अजय जी,प्रथम प्रतिक्रिया पाकर अच्छा लगा

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
July 6, 2012

मीनूजी, महिलाओं अंतर्द्वंद्व को बहुत अच्छे ढंग से आपने शब्दों में ढाला है।

    minujha के द्वारा
    July 11, 2012

    सिंह जी  प्रशंसा के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

ANAND PRAVIN के द्वारा
July 5, 2012

आदरणीय मीनू दीदी, सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद मंच पर आया हूँ आपकी पोस्ट को पढ़ा पहले ही पढ़ा था किन्तु प्रतिक्रया नहीं दे पाया था …………… एक ही बात कहना चाहूँगा एक भारतीय गृहणी की आवाज यदि इस मंच पर है तो वो आप ही हैं…………..आपकी आवाज में पवित्र भारतीय समाज की वह झलक है जो कहीं मलिन होती जा रही है………..आप यूँही सुन्दर सन्देश देतीं रहें…………..आभार

    minujha के द्वारा
    July 11, 2012

    आनंद जी,देर से ही सही आपकी प्रतिक्रया मिली ,यही सबसे बडी बात है,हार्दिक धन्यवाद

June 24, 2012

अच्छा लिखा मीनू दीदी…..बधाई

    minujha के द्वारा
    June 26, 2012

    धन्यवाद गौरव जी.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 22, 2012

क्या कहुं मानव वर्ग भले मेरी कृतज्ञता में सर ना नवाए,पर मेरी सार्थकता को तो ना नकारे….,मेरे श्रम का प्रतिदान ना देना हो ना दे पर भरपुर इज्जत तो दे,मेरी बङाई के कशीदे ना पढे पर मेरे महत्व को बस अपनी एक प्रशंसा भरी नजर ही देदे , इतना ही नहीं मीनू जी उन्हें भरपूर सम्मान …तहे दिल से प्यार और आँखों पलकों में बिठा के रखने की जरुरत है …सब कुछ अर्थ पर नहीं तोला जा सकता …अच्छी और सार्थक कहानी भ्रमर ५

    minujha के द्वारा
    June 24, 2012

    सादर धन्यवाद भ्रमर जी,आपके प्रोत्साहन से विचारों को और ढृढता मिली,हार्दिक  आभार

rekhafbd के द्वारा
June 22, 2012

मीनू जी ,एक बहुत ही अच्छा विषय उठाया है आपने ,ऐसा ही एक लेख,”दौड़ी दौड़ी भागी भागी सी ”लिखा था ,पर किसी प्राब्लम के कारण डीलीट हो गया था |एक गृहिणी के इर्द गिर्द उसका पूरा परिवार घूमता है ,नीव है वह इस समाज की ,जब कोई ईमारत बन कर खड़ी होती है उसकी मजबूती उसकी नीव से ही होती है जो दिखाई नही देती अच्छे आलेख पर बधाई

    minujha के द्वारा
    June 24, 2012

    सबसे पहले धन्यवाद,उसके बाद यह कहना चाहुंगी कि अगर  लिखना चाहतीं हैं तो अवश्य  लिखें ,क्योंकि बदलाव आवश्यक  है ,शायद  किसी की कलम  कारगर  सिद्ध हो जाए आपने वक्त  निकाला बहुत बहुत धन्यवाद रेखा जी

alkargupta1 के द्वारा
June 19, 2012

मीनू जी , समाज में भिन्न-भिन्न विचारधाराएँ व मत हैं देखने व समझने का दृष्टिकोण भी भिन्न-भिन्न है…लेकिन यह तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि एक अच्छा घर अच्छी गृहणी से ही बनता है आज भी उसके महत्त्व व अस्तित्त्व को नकारा नहीं जा सकता……… वर्तमान सामजिक परिवेश में एक गृहणी की अंतर्व्यथा को अति भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है जो अति प्रशंसनीय है

    minujha के द्वारा
    June 22, 2012

    आपके वैचारिक समर्थन  व प्रोत्साहन  के लिए  सादर धन्यवाद  अलका जी

yamunapathak के द्वारा
June 18, 2012

हेलो मीनू कैसी हो?यह ब्लॉग दो दिन पूर्व ही पढ़ा था मैंने पर आज प्रतिक्रियाएं सबमिट हो पा रही हैं.तुम्हारी बात सही है पर यह भी सही है की हमारा आकलन और महत्व सबसे बेहतर हमीं कर सकते हैं.ऐसे हालात में भी गृहणी वही करे जो उसे भी खुश रख सके हम जब तक स्वयं खुश नहीं रहेंगे दूसरों को भी खुशी नहीं दे सकते.

    minujha के द्वारा
    June 18, 2012

    जी प्रणाम ,बिल्कुल  ठीक  हुं.ठीक  कहा आपने गृहणी वही करे जो उसे खुश रख सके पर क्या एक  अच्छी गृहिणी की खुशियां उसके  परिवार से अलग  होती है,पल दो पल की खातिर चाहे वो जितना सोच  ले,पर सोच  परिवार  पर ही आकर  विराम  लेती है हां मनोनुकूल  सम्मान ना मिलना उसे दूखी अवश्य करता है,पर  सिर्फ  अपने  बारे में सोच  वो अपने परिवार को दुखी भी तो नही देख सकती…….,आप समय  निकाल कर अपने विचारों से अवगत कराती हैं अच्छा लगता है,बहुत बहुत शुक्रिया आपका

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 17, 2012

एक अजीब सी कशमकश – अंतर्द्वंद्व – घृणा-राग-द्वेष ! अछा किया जो निर्झरनी के माध्यम से बहा दिया | अस्तित्व तो स्वयं को होने का बोध है यह तो एक चींटी के पास भी होता है और हम तो आदमी हैं ! मीनू जी,……सघन अनुभूतियों के प्रकटीकरण के लिए बधाई !

    minujha के द्वारा
    June 18, 2012

    आचार्य  जी मैं तो खुद आपकी विद्वता से प्रभावित हुं ,आपकी  बधाई सर आंखों पर,हार्दिक  धन्यवाद

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीय मीनू जी ….. सादर प्रणाम ! इस बार भी एक अनूठे विषय कों अपने ही अंदाज़ में पेश किया है आपने , मुबारकबाद http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    minujha के द्वारा
    June 18, 2012

    आपकी  भी अनूठे अंदाज  में दी गई  बधाई  स्वीकार है राजकमल  जी,धन्यवाद आपका

allrounder के द्वारा
June 16, 2012

नमस्कार मीनू जी, आपके बेहद सोचनीय और विचारनीय आलेख के द्वारा कई प्रश्न आते हैं मन मैं किन्तु भारतीय परिवेश मैं जो महत्त्व एक गृहणी का है उसको नकारना किसी के बस की बात नहीं है, जो त्याग और समर्पण की भावना भारतीय नारी मैं अपने परिवार के प्रति है वह सदैव वन्दनीय रहेगी !

    minujha के द्वारा
    June 17, 2012

    सचिन जी नमस्कार एक  लंबे अरसे बाद अपने ब्लॉग  पर आपकी उपस्थिति  अच्छी लगी आपकी  बात  से मैं शत-प्रतिशत  सहमत  हुं ,पर वो श्रद्धा  दिखती नही तो तकलीफ  होती है,और आपकी तरह सोचने वाले बहुत कम  लोग  है  दुनियां में…..,तभी तो मन में नाकात्मक  भाव घर कर लेते है. प्रतिक्रिया हेतु  हार्दिक  आभार

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 15, 2012

बहुत भावप्रवण आलेख,मीनू जी.एक आम गृहिणी के दर्द को बखूबी उभारा है आपने.मेरा यह मानना है कि अच्छी गृहिणी होना और नौकरी पेशा होना दो बातें हैं.गृहिणी की भूमिका कभी कमतर नहीं होती.परिस्थितिवश भी कभी-कभी नौकरी करनी पड़ती है.

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    राजीव जी इस  रचना का उद्देश्य यही दर्शाना है कि.गृहिणी की भूमिका कभी कमतर नहीं होती. लोग  अपने नजरिये को थोङा बदलें और उसे भरपूर इज्जत  दें,आपके विचारों  के लिए बहुत बहुत  धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीया ,..सादर नमस्ते बहुत कुशलता से आपने अपने भावों को व्यक्त किया है ,..गुरुजनों ने सबकुछ कह दिया है ,..माया प्रधान समाज में यह सत्य है लेकिन इतना भावुक होने की आवश्यकता नहीं लगती ,.आप अपनी महत्ता समझती हैं यह बहुत है ,. परिवार में गृहणी की महत्ता सबसे ज्यादा है और हमेशा रहेगी ,..आपका जीवन सार्थक है यह सोच ही आपको नित्य सार्थकता देगी ,..सादर आभार

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    संतोष भाई  नमस्कार आज  बहुत  दिनों  बाद  आपको अपने ब्लॉग  पर देख  प्रसन्नता हुई आगे मैं भावुक  नही हुं बल्कि मै भी यही कह  रही हुं -  कि गृहिणी नारी के श्रेष्ठतम  रूपों में से है और उसकी महिमा को जाने अनजाने ठेस  ना पहुंचे इसका ख्याल रखना हर  किसी का कर्तव्य  है ,ताकि कभी वो ऐसा सोचने को विवश ही ना हो कि जीवन सार्थक  रहा या नही आपका आभार सहित  धन्यवाद.

आर.एन. शाही के द्वारा
June 15, 2012

मीनू जी, एक आम भारतीय गृहिणी के आहत आत्मसम्मान की बड़ी भावपूर्ण व्याख्या की है आपने । यह सत्य है कि नौकरीपेशा महिला के आत्मविश्वास से भरे परिदृश्य वाले आज के सामाजिक परिवेश में घर परिवार सम्भालने वाली गैर-नौकरीशुदा नारी का अपना अस्तित्व कहीं विलीन सा हो गया लगता है, चाहे वह कितनी भी शिक्षित सुसंस्कृत क्यों न हो । उसके त्याग और बलिदान को हमारा समाज एक आमतौर पर सुलभ अधिकार मानने का अभ्यस्त रहा है, जो स्थिति नारी को पुराने समय में तो नहीं कचोटती थी, परन्तु आज की स्थिति में वह स्वयं को भागती भीड़ के बीच कहीं उपेक्षित सी अवश्य महसूस करती है । आपने आम गृहिणी की आन्तरिक पीड़ा को जो अभिव्यक्ति दी है, वह आपकी कुशल शिल्प से युक्त लेखनी के माध्यम से ही सम्भव था । साधुवाद ।

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    आदरणीय  शाही जी आप जैसे विद्वजन  जब  रचना के तथ्य से सहमति दर्शाते है और स्नेह देते है तो लिखना सफल  हो जाता है,आपने जो ऊपर दो बातें कही उन्ही बातों को अपने आस पास  घटित  होता महसूस किया तो कलम  रूक  ना पाई.आपका आशीर्वाद  पाकर बहुत खुशी हुई बहुत बहुत धन्यवाद आपको.

krishnashri के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय महोदया , सादर , एक सार्थक प्रश्न को उठाती एक सशक्त रचना , सोचने को विवश करती हुई . बधाई .

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

     सराहने और  विचार देने  के  लिए  हार्दिक  धन्यवाद  आपका,

MAHIMA SHREE के द्वारा
June 14, 2012

मीनू जी नमस्कार …. आपने अपने शब्दों में हर उस स्त्री के दर और भाव को समाहित किया है .. जिसके अंदर भी बहुत अरमान है ..जो स्वयं भी “”"” कुछ हटके “”" के करना चाहती है .. जीना चाहती हैं पर .. बच्चो , पति और अन्य सदस्यों का जीवन सुचारू रूप से चले ..इसके लिए वो अपने सपनो का तिलांजलि दे कर अपनों को सवारने में ताउम्र जीवन गुजार देती है . पर प्रतिदान में उसे वो प्यार और मान नहीं मिलता जिसकी हकदार हैं और कहीं न कहीं एक खालीपन कचोटता है … .. आपने इस पाती में सभी गृहणियों की आवाज दी हैं … बधाई आपको .. शुभकामनाएं

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    मेरे विचार आप तक  हुबहु  पहुंच  गए  लिखना सार्थक रहा महिमा जी,आपका ह्रदय  से धन्यवाद

Mohinder Kumar के द्वारा
June 14, 2012

मीनू जी, मेरी पत्नी शादी से पहले कार्यरत थीं परन्तु मुझे लगा कि कार्यरत महिला के लिये घर और दफ़्तर दोनों को निभाने में दुगने श्रम की आवयकता होती… जैसा की मैने अपने अनुभव से सीखा. पैसा भले ही कुछ अधिक आ जाता है परन्तु परिवार इस का खामिआजा भुगतता है… आरम्भ में मेरी पत्नी को लगा कि शायद वो नौकरी न छोडती तो ठीक था परन्तु कालान्तर में वह मेरी राय से सहमत है कि आज उन्हें वाहर की भाग दौड नहीं करनी पडती और बच्चों को भी वह ठीक से देख पाई साथ ही परिवार को भी. नौकरी पेशा (जिनमे पति या पत्नी शामिल हैं) समझना चाहिये कि आफ़िस ८ -१० घंटे का होता है जबकि घर का काम २४ घंटे का है और इस बात का एहतराम करना चाहिये. आर्थिक रूप से घर को सबल करना पति का काम है और साथ ही पत्नी की सभी सुख सुविधाओं के लिये भी वही जिम्मेदार है. पत्नी “होम मेकर” है ना कि “काम वाली बाई”.. ये बात पत्नी और पति दोनों को एक दम साफ़ और सपष्ट रहनी चाहिये. मन के भावो को पाति के रूप में सबसे साझा करने के लिये आभार…..लिखती रहिये

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    मोहिंदर जी आज  आप इस बात को स्वीकार कर रहे है कि श्रीमती जी का नौकरी छोङ देना एक सही निर्णय  था,और उन्होने ये त्याग  किया यह कह कर आपने तो उनकी तपस्या को साकार तो कर ही दिया यही अपेक्षा तो हर गृहिणी को होती है अपने पति से ,परिवार से आपने अपने विचार  दिए  बहुत बहुत धन्यवाद आपका

vinitashukla के द्वारा
June 14, 2012

मीनू जी, गृहिणी भी नींव की ईंट सी होती है; उस बुनियाद पर ही परिवार की इमारत खड़ी होती है. पर परिवार के लिए वह अपना स्वत्व खो देती है, उसकी स्वतंत्र पहचान कहीं पीछे छूट जाती है. किसी को एहसास तक नहींहोता उसकी तपस्या का. सब उस पर नीरस जिम्मेदारियों का बोझ भर लादते हैं. अनगिनत स्त्रियों के जीवन की कडवी सच्चाई को उजागर करता हुआ सुन्दर और सार्थक लेख. बधाई मीनू जी.

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    आपने भावनाओं को समझा और सोच से सहमति दिखाई आपका हार्दिक  धन्यवाद  विनीता जी.

चन्दन राय के द्वारा
June 14, 2012

मीनू जी , में जब हर गृहणी का आकलन करता हूँ , तो पाता हूँ , आफिस की लपर लपर , सासु की चक चक , पति की बक बक, बच्चो के बीच बड़े ही सहजता और प्रेम से अपने आप की ढाल लेती है , इन सब के बीच कभी बमुश्किल वो वक्त निकाल पाती है अपने लिए , आपने उस गृहणी की उस अद्युत छवि को बड़े ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है हर गृहणी को मेरा सलाम !

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    चंदन जी इसी सम्मान  की भूखी है वो…., ढेर सारा धन्यवाद आपको

मनु (tosi) के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय मीनू जी , सादर नमस्कार ! लेख सचमुच अच्छा है , उक्त लिखे कई भेद भावो से मैं भी गुज़री हूँ , लेकिन फिर भी कई ऐसी बाते हम ग्रहणियों मे होती हैं जो अच्छों -अच्छों को ला -जवाब  कर देती हैं , मेरी सासु माँ भी मेरी जेठानी जी जो कि प्रिन्सिपल हैं इंटर कॉलेज मे की मेरे सामने खूब तारीफ करती हैं , पर जब रिशतेदारों के सामने करनी हो तो मेरी ही करती हैं … जैसे खाना बहुत बढ़िया बनाती है , हर चीज को मेंटेन करके चलती है ,आदि आदि … और पति जी भी जब अखबार या पत्रिका मे koi लेख या कविता छपती है तो अपने दोस्तों को खूब दिखाते हैं… इसलिए ऐसा होता रहता है ,,, निराश न हों …. धन्यवाद

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    पूनम जी आज  का युग भौतिकतावाद का है,हर कोई चाहता है कि घर में आमदनी बढे और एक  बहु से हमेशा ये अपेक्षा की जाती है कि वो तिजोरी भरने वाली लक्ष्मी है तो रसोई की अन्नपूर्णा भी सिद्ध हो……,जो बहुत  मुश्किल है ,क्योंकि एक गृहिणी के पास करने को इतना कुछ होता है कि अगर वो नौकरी करे तो उसके घर के साथ  प्रत्यक्ष  अन्याय होगा……,समझ  समझ का फेर है और कुछ  नही…,मैं  निराश नही हुं क्योकि मेरी आशा  मेरे साथ  है,प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक  धन्यवाद

June 14, 2012

एक गृहणी को गुमनाम पत्र……………! १. श्रम भी और श्रेणी भी बात कुछ अजीब नहीं लगती………….यह सच है कि श्रम कई प्रकार के होते हैं पर किसी व्यक्ति के श्रम कि कोई श्रेणी नहीं हो सकती …….! २. त्याग और वो भी किसी मूल्य के लिए फिर तो यह त्याग ही नहीं रह जायेगा कोई और शब्द उपयोग करिए………! ३. मैं नहीं समझता कि आपने अपना पहचान खो दिया बल्कि एक ऐसी पाचन को अपनाया है जिसे आप या तो कर्तव्य समझती हैं या फिर मज़बूरी………यदि कर्तव्य है तो शिकायत क्यों………और यदि मज़बूरी है तो फिर इसी तरह मजबूर बने रहिये …………एक मजबूर को शिकायत करने का भी हक़ नहीं…….! ४. आप तो पहले निश्चित हो जाए कि आप श्रम कर रही हो, त्याग कर रही हो या फिर सेवा कर रही हो या फिर गुलामी……..! आप अपनी पहचान को लेकर संशय में हो……………. ५. प्रशंसा किसके लिए श्रम, त्याग, सेवा या फिर गुलामी के लिए…………यदि श्रम, त्याग और सेवा की बात की जाय तो इन्हें प्रशंसा की आवश्यकता ही नहीं या यूँ कहें कि ऐसा कहना एक बेईमानी सी होगी…………….और यदि गुलामी के लिए तो गुलामों की प्रशंसा की नहीं जाती………! तो पाहिले आप निश्चित हो जाओ कि आप हो क्या और क्या होना चाहती हो ………….. आपका, एक शुभचिंतक

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    अलीन जी नमस्कार सबसे पहले आपके विचारों के लिए हार्दिक धन्यवाद अब क्रमवार आपकी जिज्ञासाओं का उत्तर देना चाहुंगी 1.श्रम की श्रेणी होती है ,जिसके आधार पर उसके पारिश्रमिक का आकलन किया जाता है,ये नही किया जाय तो शायद एक ही संस्थान के उच्चाधिकारी-अर्दली का वेतन समान हो….. 2.त्याग का मूल्य वहां नही होता जहां एक  पक्ष  वैराग्य की ओर अग्रसर हो जदां परस्पर स्वार्थ की भावना ना हो, जहां घर-गृहस्थी की बात हो,जीवन के प्रति मोह बरकरार हो.वहां त्याग का मूल्य खुद बखुद लग जाता है 3.कर्तव्य है, पर कर्तव्य का मतलब ये कभी नही होता कि हम अपने अधिकार भूल जाएं,और नारी कभी मजबूर नही होती,अगर  दिखती है तो उसे उसका खोया आत्मविश्वास कहते है मजबूरी नही…….और गृहिणी तो कभी मजबूर हो भी नही सकती उसके पीछे उसका पूरा परिवार होता है 4.ये सारे शब्द बस  मेरे आक्रोश के पर्याय है और कुछ नही……,मेरी  पहचान तो यथावत  है बस  उसका एहसास  सबको हो जाए यही इच्छा है 5.आपने सुना तो होगा कि इंसान  प्रेम  और प्रशंसा  का भूखा होता है,गृहिणी भी एक  इंसान है कोई  महान  आसमां से उतरा फरिश्ता नहीं और गुलाम  शब्द का तो मेरे आलेख में  जिक्र  तक नही …..कहां से जोङ  दिया आपने……… मैं निश्चिंत  हुं ,अलीन जी मैं एक  गृहिणी हुं जो बस सम्मान की लङाई लङ  रही है ,उसे हासिल करके भी  मैं एक  गृहिणी  ही रहुंगी आपका  आभार

vikramjitsingh के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय मीनू जी…..सादर नमस्कार….. आपकी सभी बातों से सहमती……लेकिन…..इतना भावुक होने की क्या आवश्यकता है…..ये तो घर-घर की कहानी है….”तुम करती क्या हो सारा दिन…..???” माना….कुछ अपवाद होते हैं….लेकिन स्थिति इतनी बदतर तो नहीं हो सकती कि एक गृहणी….को अपने ही घर में….अपनों के द्वारा तिरस्कृत किया जाये….जरूरत है….अपनी मानसिकता को साकारात्मक बनाने की…..फिर देखिये…..जिंदगी कितनी आसान हो जाती है…./// अब देखिये ना…..अगर गोलगप्पे खाने का मन करे तो एक गृहणी ही अपना ये शौक आसानी से पूरा कर सकती है…..लेकिन काम-क़ाज़ी महिला को इस काम में भी सोचना पड़ता है…..कैसे…?….क्यों….?…किसलिए….?…..इसका फायदा-नुक्सान….?? अगर गला खराब हुआ तो ऑफिस से छुट्टी…..मिलेगी या नहीं….चलो नहीं खाते….?? ये तो छोटा सा नमूना है…..और भी बहुत फायदे हैं…..सोचिये….फिर देखिये……अजी आप तो गृह-लक्ष्मी हैं…..आप घर से नहीं—-घर आपसे है….//// आपका मुकाबला कौन करेगा……///// so….relax and enjoy yourself…..thanks….

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    भाईसाहब बात  तिरस्कार की नही है…….,ना सोच  नकारात्मक  है एक  छोटी सी  मांग  है अपनों से कि वो मेरे अस्तित्व को थोङी  सी तवज्जो देदें ताकि मैं खुद को किसी से कमतर  ना समझुं.बस………..सादर धन्यवाद

sinsera के द्वारा
June 14, 2012

प्रिय मीनू जी, नमस्कार, गहरी बातें हैं आपके लेख में….भोगा हुआ यथार्थ….लगभग 70 %घरों में ऐसा ही होता है, …मोहे न नारी नारी के रूपा..न जाने सिर्फ हमारे ही देश में बहुओं को ये b grade citizenship क्यूँ दी जाती है…. दो लाइने मैं भी कहना चाहूंगी…. जब मांग भरी गयी थी दमड़ी के सिंदूर से, तभी समझ लेना था, की हर मांग की कीमत दमड़ी के बराबर ही मानी जाएगी… लड़कियां धान का बिरवा हैं जहाँ उगती हैं,वहां से जब, जड़ से उखाड़ी जाएगी , किसी और ज़मीं पर ही पनप पाए गी…

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    सरिता जी आपकी चार पंक्तियां तो सबकुछ कह गईं बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने समय  निकाला.आभार

akraktale के द्वारा
June 13, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार, यह पहली बार नहीं है, गृहणी का दर्द कई बार इलाज के लिए पुकार चुका है किन्तु आज तक कोई सही दवा नहीं मिली है. अब बच्चों का भी रुख ऐसा होगा किसे पता था और सासू माँ तो हमेशा घर में रहने वाली बहु को ही ज्यादा लाड करती थी क्योंकि वह उसके साथ दिन भर दुःख सुख को बाँट भी तो पाती थी अब वह भी कामकाजी बहु को दुलारने लगे तो फिर दिल पर पर्त्थर तो रखना ही होगा. बहुत जरूरी है इस श्रम को पुरस्कार देना, कई बार खान ठीक से ना बना हो या समय से ना बना हो तो बातें भी सुनने को मिलती हैं किन्तु जब कोई खाने पर आये और उंगलियाँ चाटते रह जाए तो तारीफ में श्रम का भुगतान भी करता है. कभी समय पर नाश्ता न मिलने से नाराज पति महोदय प्रतिदिन पत्नी की तैयारियों के कारण ही समय पर पूरी तरह तैयार हो कर पत्नी के कारण ही तो जाते हैं कभी उनका मन तारीफ़ करने को करता तो होगा. और फिर समकक्ष क्या आपने यह जुमला तो सूना ही होगा घर का जोगी जोगना और आन गाँव का सिद्ध. अब इसको कैसे झुठलाया जाए. सुन्दर और मार्मिक आलेख. कोशिश जारी रही तो एक दिन गृहणी के घरेलु श्रम का भी बड़ा नाम होगा. शुभकामनाएँ.

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    रक्ताले जी बहुत बहुत धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया,सराहना और शुभकामना तीनों के लिए,सच है जमाना बदला है और उसके साथ साथ इंसान की सोच भी,साभार.

anoop pandey के द्वारा
June 13, 2012

अच्छा और सार्थक लेख मीनू जी. हमारी पत्नी तो बाकायदा हमसे वेतन लेती है और वर्ष के अंत में उनका बैंक बैलेंस हमसे ज्यादा ही रहता है.

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    अनूप जी नमस्कार व स्वागत  ब्लॉग पर आप जो कर रहे है वो निश्चित  रूप से एक  सराहनीय उदाहरण  है,पर क्या आप पांच  अपने जैसे लोगों का ही उदाहरण  दे सकते है जो आपके सी सोच रखते हो… वैसे  पैसा यहां उतना प्रमुख मुद्दा भी नहीं..,उचित  सम्मान ज्यादा महत्वपूर्ण  है,बहुत बहुत धन्यवाद आपका

yogi sarswat के द्वारा
June 13, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार ! आपने बड़ी खूबसूरती से एक गृहणी के दर्द को उकेरा है, यह विश्लेषण लगभग सभी गृहणी पर लागू होता है ! मुझे व्यक्तिगत तौर पर भारतीय नारी का आत्मविश्वास बहुत ज्यादा लगता है क्योंकि वो संकरों और मर्यादा को बनाये रखते हुए भी अपने काम सिद्ध करती है और परिवार को एकजुट भी बनाये रखती है ! मैं ये देखकर प्रसन्न होता हूँ की टेली विजन के सास बहु के किस्सों से अलग भी एक दुनिया है जहां प्यार ही प्यार है ! गृहणी के त्याग को उतना ही सम्मान मिलना चाहिये जितना कि एक देशभक्त एवं ईश्वर भक्त को।मैं श्री आस्तिक जी की इस बात से सहमत हूँ

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आपने सही कह रहे हैं योगी जी पर कहां समझ पाते है आजकल  के लोग  ,जो हर शय के पीछे सिर्फ  भौतिकता तलाश  करते है,उनके  लिए ये बाते कोई मायने ही नही रखतीं, धन्यवाद आपके विचारों के लिए

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 13, 2012

अंतर्द्वंद , किसको क्या मिला ये मुकद्दर की बात है एक चाँद आसमान पे है एक मेरे साथ है कुशल गृहणी को अपने आप वो सब कुछ मिलता है जो एक काम काजी महिला को नही मिलता दिल मांगे मोर स्नेही मीनू जी, सादर इतना काफी नहीं है क्या . बधाई

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    नही चाचा जी,ये सब कहकर फुसलाईये नहीं हमारे हक  की लङाई में हमारा साथ  दीजिए वैसे भी ये भावनाओं की लङाई है ,…,आपका सहयोग  अपेक्षित  है,……,वरना चाची जी से बात करनी होगी…(डर गए ना),सादर धन्यवाद आपका

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    June 14, 2012

    स्नेही मीनू जी, शुभाशीष लगता है चची का रंग भतीजी पे आ गया है. ऊपर की पंक्तियों में सब कुछ लिखा है. १. अंतर्द्वंद , महाभारत में रन क्षेत्र में अर्जुन की यही स्थिति थी. व्याख्या स्वयं करिए. न समझे तो फिर बताऊंगा. २. किसको क्या मिला ये मुकद्दर की बात है त्याग व् बलिदान. धरती माँ की तरह . ३. एक चाँद आसमान पे है एक मेरे साथ है आपका बहुत बड़ा सौभाग्य है कि आपके पतिदेव मेरे परम आदरणीय दामाद को आप से यह कहने का सु अवसर प्राप्त होता रहता है. अगर दोनों ही व्यस्त हो जाते तो ये सुनने का अवसर न मिलता. ४. दिल मांगे मोर आपकी व्यथा स्वभाविक है पर आपका दिल और चाहत रखता है. ऐसा ही समाज हो गया है. जरा अपने दिल पे हाथ रख कर सोचिये जिन पात्रों की तरह जीने की लालसा आप में उत्पन्न हो रही है क्या वो जीवन बढ़िया है या आपका अपने परिवार के साथ का पूर्ण समर्पित जीवन. बताइए मैं कहाँ भगा था जो आप चाची से शिकायत करने वाली थीं. एक कहावत है कि थोडा लिखा ज्यादा समझना. दूसरी नहीं बताऊंगा. मेरे दामाद जी को ise पढ़ा इयेगा और हमें बताइयेगा

    minujha के द्वारा
    June 15, 2012

    आदरणीय चाचा जी कल से ही आपको और अलीन जी को लिखने के लिए तत्पर थी,पर नेट साथ देने को तैयार ही ना था पहली बात - आपकी हर बात  मेरी समझ  में आ   गई ,पर  मैं कहा कह रही हुं कि मैं उन पात्रों की तरह बनना चाहती हुं मैं तो बस यही कह रही हुं कि मैं संतुष्ट हुं अपने आप से,पर मेरे अपने नहीं…..,यही कारण  है कि वो मुझे वह सम्मान नही दे पा रहे जिसकी मैं  हकदार हुं.,और अगर देना  चाहते भी है तो वो दिखता नही……..बस वैसे आपको बता दूं आपकी बातो को जब मैने आपके दामाद जी से बताया तभी से वो आपकी विद्वता के गुण  गाने लगे है….,जो मुझे भी अच्छा  लगा वैसे एक  बात जरूर बता दीजिएगा-…….चाचीजी के नाम से डर गए ना………

dineshaastik के द्वारा
June 13, 2012

मीनू जी नमस्कार, एक  गृहणी की वास्तविक  पीड़ा। परिवार  एवं समाज  के निर्माण  गृहणी का महत्वपूर्ण योगदान  है। वह परिवार को जोड़कर रखती है। इसके बदले में उपेक्षा कितनी पीड़ादायक  है। गृहणी के त्याग को उतना ही सम्मान  मिलना चाहिये जितना कि एक देशभक्त  एवं ईश्वर भक्त को। गृहणी को परिवार भक्त का दर्जा तो मिलना ही चाहिये। वही परिवार का निर्माण करती है। 

    jlsingh के द्वारा
    June 13, 2012

    आदरणीय मीनू जी, सादर अभिवादन! आपने बड़ी खूबसूरती से एक गृहणी के दर्द को उकेरा है, यह विश्लेषण लगभग सभी गृहणी पर लागू होता है ….. पर मैं अपनी पत्नी के साथ उन सभी गृहणियों की इज्जत और आदर की नजर से देखता हूँ जिन्होंने अपने त्याग से परिवार और अपने बच्चों में वह संस्कार पैदा करने में सक्षम साबित हुई हैं, जो कामकाजी महिला नहीं कर पाती समयाभाव के चलते. कुछ चीजें नजर नहीं आती महसूस की जाती हैं. मेरी माँ ने, मेरी बहनों ने, मेरे बड़े भ्राता ने, परिचितों ने मेरी पत्नी के क्रिया कलापों को हमेशा सराहा है ….. फिर भी मैं यह दावे के साथ नहीं कह सकता कि जो दर्द आपने बयान किये हैं, वह मेरी पत्नी महसूस नहीं करती होगी…. तब का माहौल कुछ और था ज्यादा लोग अपनी पत्नी को गृहणी ही बनाये रखना चाहते थे. आज जिन्दगी बहुत तेज गति से दौड़ रही है ….. सबको अपनी अपनी पड़ी है. आपका दर्द वजिब है …. सांत्वना के लिए कहूँगा … यह पृथ्वी हम सबकी माँ हैं ….. आज यह कितना दर्द सह रही हैं … किसी ने पृथ्वी माँ के दर्द को महसूस किया है ? अगर महसूस किया भी है तो दर्द को कम करने के क्या उपाय किये हैं? ….. आपकी भावना के साथ पूरी हमदर्दी के साथ – जवाहर!

    nishamittal के द्वारा
    June 13, 2012

    सिंह साहब ,निश्चित रूप से आप बधाई के पात्र हैं क्योंकि आपकी पत्नी को वो सम्मान नमिला जिसकी वो अधिकारिणी हैं,मेरे स्वयं के साथ भी ऐसा ही है,मेरे परिवार में मेरे डिग्री कालेज के जॉब का मोह त्यागने का सम्मान पूर्ण रूपें मिला है.हाँ अब फ्री हो जाने पर मुझको लगता है कि अब जॉब करने का समय है, मीनू जी ने नारी के जिस त्याग और पीड़ा को व्यक्त किया है वो निस्संदेह वास्तविकता है,अपवाद सर्वत्र होते हैं परन्तु आम समाज की स्थिति यही है.

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आस्तिक  जी बस  उसी आस  में वो अपनी पूरी जिंदगी बीता देती है आप उसके त्याग  को भले कोई दर्जा ना दें ,स्वीकार तो करें…….

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    जवाहर जी ये आपने बिल्कुल   सही कहा,मैं भी उन्ही के जैसी कुछ खुशकिस्मत नारियों में से एक हुं, भरपुर खुशियां दिन-रात का एहसास ही नही होने देतीं ,पर पुरे दिन भर में वो एक क्षण अवश्य आता है जो मेरी उच्च  शिक्षा,शिथल पङे मन और कुछ कर पाने की दबी छूपी ललक  पर मुस्कुरा कर चला जाता है और मेरा ये दर्द  स्वयंसृजित है क्योंकि मैने ही प्राथमिकता  परिवार को देने का निर्णय  लिया था……,पर सबके साथ ऐसा कहा होता है आपकी संवेदनाओं के लिए हार्दिक   आभार

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आदरणीय   निशा जी आपने सही कहा अपवाद हर जगह होते है खुद मैने कई गृहिणियों की आंखों मे उस रिक्तता को पढा है ,जो सम्मान के अभाव से उत्पन्न होती है,प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद आपका

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आस्तिक  जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद

omdikshit के द्वारा
June 12, 2012

मीनू जी, नमस्कार. बहुत ही सार-गर्भित ,भावपूर्ण प्रस्तुति.

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    हार्दिक  धन्यवाद ओम जी,आपकी सराहना हेतु.


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