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आओ उसकी जिंदगी सजाएं

Posted On: 18 May, 2012 Others में

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सफेद झक साङी ,गले में तुलसी माला,श्रृंगारविहीन तन और चेहरे पर चस्पां बेबसी के भाव,जो ना जीने दे ना मरने,बस घिसे पिटे उसूलों को किस्मत मान ढोना उस अमूल्य जीवन को ,जिसको सार्थक करना हर इंसान का कर्तव्य भी है और अधिकार भी,पर कहां …. उसे तो इंसान भी नही माना जाता,जी हां मै उसी औरत की बात कर रही हुं ,जिसका जीवनसाथी बीच रास्ते में ही उसे छोङ जीवन को अलविदा कह जाता है ,जिसे समाज ने विधवा का नाम दिया है,जिस इंसान ने उसकी जिंदगी में जाने कितने रंग भरे,उसी की चिताग्नि में उस स्त्री की सारी खुशियां,सपने और रंगों को स्वाहा कर दिया जाता है,रह जाती है तो बस सफेदी में लिपटी,एक अभागी,लाचार सांस लेती एक नारी देह…,एक तरफ तो अपनी वैवाहिक खुशियों को खोकर यूंहि वो स्तब्ध होती है और उसी परिस्थिति में समाज उसपर वर्जनाओं की एक लंबी श्रृंखला थोप कर हर पल ये एहसास दिलाना चाहता है कि वो अधूरी हो चुंकी है और इस अधूरेपन में उसकी साथी सुखद यादें नही प्रतिपल दुखी करने वाले कायदों की फेहरिश्त होगी,जो उसके घावों को भरने तो नही ही देगी हां नासूर जरूर बना देगी………..पूजा-पाठ,धार्मिक कर्मकांड करने और समाज से यथासंभव दुरी बनाए रखने की ताकीद के साथ,वस्त्रों,आचार-विचार ही नही खाने-पीने तक में सादगी का पालन करने का आदेश……..,”कहां है समाज की संवेदनाएं”
नारी के सहनशीलता की परीक्षा की पराकाष्ठा नही तो और क्या है ये जहां वो अपना सहारा भी खोती है और नियमों के बोझ तले दबकर अपनी ख्वाहिशें भी…,सतीप्रथा भले ही खत्म हो गईं हो,.. हर पल जलाने वाली दुश्वारियां तो उससे भी बदतर हैं,यही नही पीङिता की आयु कम हो या ज्यादा..आक्षेपों का जो सिलसिला चल पङता है उससे भी बचने की एक त्रासदी……आखिर कैसे इंसान है हम जो उसके मां,बहन,बेटी वाले रूप को भूलाकर उस बदरंग चेहरे को ही उसकी सबसे बङी पहचान बना डालते है……
मैने कही पढा था एकबार- “दुख को दूर करने की सबसे अच्छी दवा है कि उसका चिंतन छोङ दिया जाय क्योंकि चिंतन से वह सामने आता है और अधिकाधिक बढता है……,” क्या उसपर थोथे आडंबर और जकङी हुई रुढिवादी सोच को लादने का उद्देश्य यही है कि कभी वो अपने उन गमियों से बाहर ही ना आ सके,उसने पति खोया है जीने का अधिकार नही ,हर इंसान गिनी हुई सांसों के साथ दुनियां में आता है, फिर जीवन चक्र का दोष एक नारी पर क्यों…,आज काशी-बनारस,वृंदावन में जो असहाय ,निर्बल,लाचार बेबस विधवाओं का कुनबा बसा है क्या वो हमारी प्रगति के मुख पर करारे तमाचे से कम है…..,जहां हर उम्र,हर तबके, हर वर्ग की औरते ,मजबूरी और ढकोसलो में दबी मोक्ष मार्ग बनाने में लगी है,क्या आपको लगता है कि वे सबकी सब अपने जीने की अभिलाषा खो चुकी होंगी.,फिर भी बाध्य है उस जीवन को अपनाने के लिए ,क्योंकि उनके समाज में उनकी स्थिति और भी विकट है,वहीं एक अनजान जगह पर बिन पहचान वाली जिंदगी जीना ज्यादा सरल भी है और तनावमुक्त भी,हंलाकि वहां भी कोई खास तवज्जो नही मिलती इनके अस्तित्व को पर कहते है ना कि अपनों की रूसवाई से गैर के ताने बेहतर है…..,जहां तक सरकार की बात है तो पुनर्विवाह को कानूनी सहमति देकर सरकार ने इस मसले पर ज्यादा ध्यान देना कभी भी उचित नही समझा…..अब कितने पुनर्विवाह होते होंगे और कितनी जिंदगियां फिर संवरती होंगी ये तो आप भी जानते होंगे
तो अब ये हमारा कर्तव्य है कि अपनी बिरादरी,समाज,आसपास,परिवार जहां भी हमें ऐसी अबलाएं दिखें हम उनके मन से ना केवल परिवार पर बोझ बन जाने के पूर्वाग्रह को निकालें बल्कि उम्र और काबिलियत के हिसाब से उन्हे जीवन को चलायमान बनाए रखने की दिशा दिखाएं ताकि अन्य ओर ध्यान लगा कर उसकी जिंदगी के बांकी दिन भी संवरे और अपनी अपूरणीय क्षति को भूलने का बहाना भी वो पा सके-ये हमारा नैतिक कर्तव्य भी है और मानवता का एक प्रमुख धर्म भी……बस समाज की दयादृष्टि के साथ साथ मानसिक और भावनात्मक संबल चाहिए उसे………………….कुदरत प्रदत्त उस खाई से भी गहरे जख्म को तो कोई नही भर सकता पर उसके ऊपर समाज के सहारे व संवेदना की मूंज जरूर बांधी जा सकती है,जिसपर चलने में उसके पांव तो जरूर डगमगाएंगे पर पार उतरते उतरते वो अपना खोया आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पुन: प्राप्त कर लेगी…….जिंदगी के रूपहले रंग भले फिर उसके दामन में ना छिटके,पर अपनी मेहनत और लगन के रंगों से हासिल स्वाबलंब से वो जरूर अपनी जिंदगी सजा लेगी,….बस हमे माध्यम बनकर उसे उसकी क्षमता का एहसास दिलाना होगा ,जीने के एक सही राह दिखानी होगी…ताकि एक जीवन यूंहि अंधेरी कोठरी में घुटते-सिसकते ,अपने आप को कोसते अपने
अनंत सपनों को समेटते जाया ना हो जाए………….,क्या आपका दिल नही चाहेगा—-“आओ उसकी जिंदगी सजाएं.”….

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74 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी … बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!! शुभकामनायें. .

मनु (tosi) के द्वारा
June 10, 2012

आदरणीय मीनू जी , सादर नमस्कार ! बहुत ही बढ़िया सवाल उठाए हैं आपने ! और आपकी अंतिम पंक्तियों से पूर्णतया सहमत !!!!

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    बहुत  दिनों बाद अपने ब्लॉग पर आपको देख  खुशी हुई  पूनम जी,सहमति के लिए धन्यवाद आपका

yamunapathak के द्वारा
May 26, 2012

मीनू,आजकल तुम बहुत दिनों बाद मंच पर दिखती हो.ये लेख मैंने पढ़ा था पर प्रतिक्रिया सबमिट नहीं हो पा रही थी.और आज जब सफलता पूर्वक हो रही है तो बस बाकी दिनों की भी कर ले रही हूँ.मंच पर अपनी भावना से मिलाती जुलती विचारधारा से रु-ब -रु होना बहुत भला लगता है मुझे.यह लेख बहुत ही पथेटिक समस्या की ओरे ध्यान खींचता है. शुक्रिया.

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आपने इतनी इज्जत बख्शी ,बहुत बहुत शुक्रिया आपका

punitasingh के द्वारा
May 24, 2012

मीनूजी आपके विचार बहुत अच्छे लगे |आप अपना काम करती जायें लोगों का काम है कहना वो अपने अन्दर जो है उसे जाहिर ज़रूर करतें है बिना यह सोचे कि इस बात का समाज पर क्या असर होगा |अभ्रद भाषा प्रयोग करने वालों के लिए जागरण जगशन को कड़े कदम उठाने चाहिए |बैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं भाषा पर हमारा नियंत्रण ज़रूर होना चाहिए | मेरे विचार में यह मंच विचारों को लोगों के एक बड़े हिस्से तक पहुंचाने का माध्यम है ना कि आपसी खुन्नस निकालने का अखाड़ा |सभी पाठको और बुध्द्जीवियो से निवेदन है किसी को जलील करने से पहले सौ वार ज़रूर सोचे |यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम अपमान तो ना कीजिए |एक लेखक समाज को बहुत हद तक सच्चाई का परिचय देता है |मर्यादा नाम की एक चीज़ होती थी कही ऐसा अकाल ना पड़े कि लोग तमीज को ढूढ़ते रह जाए |

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    आपकी सोच  बहुत सटीक और खरी है पुनीता जी विचारों को आपने सराहा खुशी हुई,धन्यवाद आपका

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

    minujha के द्वारा
    May 23, 2012

    सरिता जी नमस्कार विगत  कुछ  दिनों से समय  कम  मिल पाने  के  कारण  जब  मैं  लॉग -इन  करती  हुं  तो ज्यादातर  जो रचनाएं फीचर्ड होती है उन्ही को पढकर अपने विचार प्रकट कर पाती हुं,या फिर नीचे पाठकों की जो प्रतिक्रियाएं होती है उनपर जाकर,अब अलीन जी ने कब ये रचना पोस्ट की और इसके अंदर क्या था इससे मैं अनभिज्ञ  हुं,वैसे  भी सच कहुं तो उनकी ज्यादातर रचनाएं मेरे सर के ऊपर से निकल  जाती हैं और अक्सर मैं अपनी बुद्धिमत्ता को कोस उठती हुं,वैसे ये भी कहुंगी कि अगर उन्होने कोई गलती की हो तो उन्हे अवश्य स्वीकार कर उसमें सुधार करना चाहिए,चलिए  आप भी अब गुस्सा थुकिए और उन्हे अनुज  समझ  माफ  कर दीजिए बेचारे कुशवाहा जी के पास माफी की गुहार  लगा रहे थे…..और भला कमेंट  डिलीट की बात  हम सोच भी कैसे सकते है वो भी आपकी.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 21, 2012

बहुत सार्थक आलेख,मीनू जी.कुछ दिनों के लिए मंच से ब्रेक ले लिया था.आते ही आपका आलेख पढ़ा.बिल्कुल सही सवाल उठाए हैं आपने.

    minujha के द्वारा
    May 22, 2012

    राजीव जी हार्दिक  धन्यवाद आपके विचारों की प्रतिक्षा थी,आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 20, 2012

आदरणीय मीनू दीदी, सादर प्रणाम आपने जो विषय उठाया है उससे आपने एक ऐसा कार्य किया है जो ना सिर्फ sraahne योग्य है बल्कि समाज ko iske लिए aapkaa rini rahnaa hogaa बहुत hi jatil prashn aur maansiktaa है in muddon par logon ki jise badalnaa hi hogaa kab badlenge yah dekhnaa है der se pratikriyaa ke लिए cshmaa padh to pahle hi liyaa thaa

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आनंद  भाई   इतनी प्रशंसा ना करें ,मै उस  लायक  अभी अपने को नही समझती  जटिलताएं तो अनगिनत है ही  इस राह में पर कदम तो बढाना ही होगा… और माफी तो मुझे मांगनी चाहिए आपके पिछले ब्लॉग पर आपको डॉट  पिलाकर आने के लिए… आपका धन्यवाद आनंद जी

आर.एन. शाही के द्वारा
May 20, 2012

मीनू जी, संवेदनशील सामाजिक विषमताओं पर आपके मंथन की शृंखला की यह कड़ी भी एक ज्वलन्त प्रश्न के साथ-साथ समाधान का रास्ता भी दिखाती प्रतीत होती है । सरकारी स्तर से इस मामले में किसी सहायता की अपेक्षा रखने का कोई तुक नहीं बनता । उसने कानूनन रास्ता निकाल दिया, यही बहुत है । अन्तर्जातीय विवाह हो या विधवा विवाह, समाधान का सारा दारोमदार समाज का ही होता है । हमारी कुरीतियाँ बेड़ी बनकर हर जगह हमारे पाँव जकड़ लेती हैं, जिनसे छुटकारा पाना आसान नहीं है । विधवाओं की स्थिति सचमुच बड़ी भयावह होती है । सबसे पहला कदम पूरे साहस के साथ यदि विधवा से जुड़े दोनों परिवार उठाने का संकल्प ले लें, तो थोड़ी नानुकुर और थुक्का फ़ज़ीहत के साथ समाज को अन्तत: उनका निर्णय स्वीकार करना पड़ता है । परन्तु अक्सर इस मसले पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे, ऐसी स्थिति में ये परिवार मूक-बधिर बनकर अपने ही एक अंग को अभिशप्त जीवन जीने की राह पर धकेल देते हैं, यह एक कड़वा घूँट है । साभार !

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आदरणीय  शाही जी आपका आभार  आप ब्लॉग  पर आए,  आपने सही कहा बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे, वैसे भी अक्सर देखने में यही आता है कि ससुराल  पक्ष   वाले उस स्त्री  और उसके दुर्भाग्य को ही मौत का जिम्मेदार ठहराते है,अगर वे  सह्रदय  होकर सोचते भी है पुनर्विवाह के लिए तो हर जगह उसका अतीत  आगे  आ जाता है,इन सबके बाद भी अगर  विवाह हुआभी तो जिंदगी भर उससे एहसान मानने की अपेक्षा रखी जाती है, फलत जैसी स्थिति हो उसे ही भागय मान लेना इनकी मजबूरी भी हो जाती है और कहे तो किस्मत भी आपके  विचारों  को  पाकर अत्यंत खुशी हुई,पुन आभार आपका

yogi sarswat के द्वारा
May 20, 2012

आदरणीय मीनू जी सादर नमस्कार ! बहुत मुश्किल होता है ऐसे जी पाना ! लेकिन हिम्मत के साथ अगर मुकाबला किया जाये तो ऐसी समस्याएं आसान हो जाती हैं ! सर्व प्रथम आपको बधाई इस बात की आपने बहुत अच्छा विषय चुना ही नहीं प्रस्तुत भी बहुत अच्छा किया है.यहा आपने जो समाधान दिया है आपकी उस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि “अपनी बिरादरी,समाज,आसपास,परिवार जहां भी हमें ऐसी अबलाएं दिखें हम उनके मन से ना केवल परिवार पर बोझ बन जाने के पूर्वाग्रह को निकालें बल्कि उम्र और काबिलियत के हिसाब से उन्हे जीवन को चलायमान बनाए रखने की दिशा दिखाए” बहुत सटीक , सार्थक लेखन !

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    बस  आप सबका उत्साहवर्धन ही है जिस से  प्रेरित हो कलम  चल पङती है..प्रतिक्रिया  के लिए  हार्दिक आभार

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 20, 2012

आदरणीया मीनू जी नमस्कार आपके विचारों से पूर्णतः सहमत. एक ज्वलंत मुद्दे पर आपने लेखनी चलायी है. जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता. आभार…

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    सच  कहा आपने  अजय जी ध्यान  ना देना ही सारी समस्या की जङ है बस  हमें अपनी जिम्मेदारियों  को समझना होगा

vinitashukla के द्वारा
May 20, 2012

आज के आधुनिक समाज में भी विधवा और परित्यक्ता की स्थिति अच्छी नहीं है. पुरुष और स्त्री के लिए दकियानूसी समाज में, हमेशा से ही दोहरे नैतिक मापदंड हैं. जहां एक तरफ पुरुष एक पत्नी के रहते भी दूसरा विवाह कर लेता है; वहीं दूसरी तरफ; पति के काल- कवलित होने के पश्चात भी दूसरा विवाह करने वाली स्त्री को बुरा समझा जाता है. एक सार्थक मुद्दे को उठाने हेतु बधाई मीनू जी.

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    बहुत अच्छी  बात  कही आपने विनीता जी यही नही पुनर्विवाह अगर हो भी तो पहली शर्त  होती है कि उस स्त्री के बच्चे ना हो जबकि पुरूष पुनर्विवाह  बच्चों का ही हवाला देकर  किया करते  है, आपका आभार 

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
May 20, 2012

नमस्कार मीनू जी, आपको मेरा पूरा समर्थन |

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यवाद  विवेक  जी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 20, 2012

बस समाज की दयादृष्टि के साथ साथ मानसिक और भावनात्मक संबल चाहिए उसे………………….कुदरत प्रदत्त उस खाई से भी गहरे जख्म को तो कोई नही भर सकता पर उसके ऊपर समाज के सहारे व संवेदना की मूंज जरूर बांधी जा सकती है,जिसपर चलने में उसके पांव तो जरूर डगमगाएंगे पर पार उतरते उतरते वो अपना खोया आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पुन: प्राप्त कर लेगी…….जिंदगी के रूपहले रंग भले फिर उसके दामन में ना छिटके,पर अपनी मेहनत और लगन के रंगों से हासिल स्वाबलंब से वो जरूर अपनी जिंदगी सजा लेगी,….बस हमे माध्यम बनकर उसे उसकी क्षमता का एहसास दिलाना होगा ,जीने के एक सही राह दिखानी होगी…ताकि एक जीवन यूंहि अंधेरी कोठरी में घुटते-सिसकते ,अपने आप को कोसते अपने अनंत सपनों को समेटते जाया ना हो जाए………….,क्या आपका दिल नही चाहेगा—-“आओ उसकी जिंदगी सजाएं.”…. प्रिय मीनू जी , सस्नेह सर्व प्रथम आपको बधाई इस बात की आपने बहुत अच्छा विषय चुना ही नहीं प्रस्तुत भी बहुत अच्छा किया है. मेरे विचार आपसे शत प्रतिशत मिलते हैं . ek वर्ष ki संतान होने पर ममेरी बहन के सम्मुख पुनर विवाह का प्रस्ताव रखा था हलन की उसने स्वीकार नहीं किया उसका एकलोता पुत्र आज इंजिनीअर है. अपनी मान को भी श्वेत वस्त्र dharan करने नहीं दिया. जिन परम्पराओं में विधवा pravesh वर्जित है सारे कार्यक्रम मान के हाथों संपन्न कराये. हरेक को जीने का adhikar है. यदि सही व्यवस्था प्राप्त हो जाये तो पुनर विवाह अनुचित नहीं पर saavdhani के साथ. समाज और विकृत होता ja रहा है.

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आदरणीय  कुशवाहा जी आप सबों की सराहना बहुत  मनोबल  देती है सच कहा  आपने सावधानी पहली शर्त  है आपका हार्दिक  आभार 

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 20, 2012

वास्तव मे कई बार यहाँ जेजे मे तरह तरह के मुद्दे उठाए जाते हैं…….. पर समाधान कोई नहीं सूझाता है….. यहा आपने जो समाधान दिया है आपकी उस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि “अपनी बिरादरी,समाज,आसपास,परिवार जहां भी हमें ऐसी अबलाएं दिखें हम उनके मन से ना केवल परिवार पर बोझ बन जाने के पूर्वाग्रह को निकालें बल्कि उम्र और काबिलियत के हिसाब से उन्हे जीवन को चलायमान बनाए रखने की दिशा दिखाए”

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    पंत जी आपकी प्रशंसा पाकर बहुत अच्छा लगा,समाधान  की सार्थकता तभी सिद्ध होगी ,जब इस ओर कदम उठेंगे आपके विचारो  के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
May 20, 2012

आदरणी्य मीनू जी आपके विचारों से पूर्णातः सहमत, क्यों न हम  सब  मिलकर इस  क्षेत्र  में कुछ  प्रयास  करें।

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    दिनेश जी समय  की यही पुकार  है, हम सभी को जागृत  होना होगा, आपका धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
May 19, 2012

minu जी मे आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ ,सशक्त विषय ,आभार

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    रेखा जी,ब्लॉग पर आगमन  और  विषय  पर सहमति  दोनों के लिए  आपका  धन्यवाद

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 19, 2012

आदरणीय मीनू जी ….. सादर प्रणाम ! कल आपकी इस रचना पर कमेन्ट पोस्ट हो नहीं पा रहा था …. शुकर है की आज सफलता मिल ही गई …

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 19, 2012

आदरणीय मीनू जी ….. सादर प्रणाम ! एक अपेक्षित विषय को आपने अपनी शशक्त कलम से हम सभी के ध्यान में लाने का सद्कार्य किया है उसके लिए हार्दिक आभार

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    राजकमल  जी आपने अथक  प्रयास  कर अपने  विचार  दिए आपका कैसे शुक्रिया करूं  समझ नही  पा रही बहुत बहुत धन्यवाद

sinsera के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी नमस्कार, एक सुप्त और उपेक्षित विषय की ओर ध्यान आकर्षित कराने के लिए बहुत बहुत बधाई……सब कुछ तो आप ने लिख ही दिया है…पूर्ण सहमत…

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    सरिता जी विषय सुप्त  और उपेक्षित  बिल्कुल  नहीं  है  जैसा मैने रक्ताले जी  से  कहा अभी  चार -आठ  दिन  पहले  ही इसी मंच  पर इस  विषय  पर पढा  था… आपने पढकर  सहमति  दी  बहुत  बहुत  धन्यवाद  आपका

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 19, 2012

TESTING

sadhana thakur के द्वारा
May 19, 2012

मीनू ,एक बेहतरीन सोच ,पर मार्ग कठिन ,पर प्रयास तो किया ही जा सकता है …………आओ शुरुवात खुद से करें ……..

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    इतने दिनों बाद ब्लॉग  पर आपका आशीर्वाद  पाकर बहुत खुशी हुई,अपनी रचना कब पोस्ट कर रहीं है.

vikramjitsingh के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी…सादर…. सार्थक और विचारणीय विषय….. जरूरत है….एकजुट होकर आपसी विश्वास को बहाल करने की…..

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    विक्रम जी कहां थे आप…,आपको विचार अच्छे लगे बहुत बहुत धन्यवाद आपका

alkargupta1 के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी , अर्थपूर्ण विषय पर सराहनीय विचारों की प्रस्तुति

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आदरणीय  अलका जी बहुत बहुत  आभार आपका

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 19, 2012

मीनू झा जी सादर- बहुत ही भावात्मक व संदेशात्मक आलेख………………………………. रुदिवादिता पर करार प्रहार करता हुआ आलेख……………………………. विधवाओं को सम्मान से जीने का अधिकार मिलना ही चाहिए.

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आपने सोच को सार्थक  कहा आपका शुक्रिया  अंकुर जी

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी नमस्कार … बहुत ही सही प्रश्न उठाया और उसके सार्थक विचार आपने रखे …. विधवाओ को उनकी मर्जी का जीवन जीने का खुला अधिकार मिलना ही चाहिए , समाज को उनके प्रति अपने परम्परागत दकियानूसी विचारो से ऊपर उठाना ही होगा …. साधुवाद आपको

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    महिमा जी  आपका समर्थन  मिला  अच्छा  लगा धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी एक सार्थक विषय को विचारार्थ प्रस्तुत करने पर साधुवाद

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    बहुत बहुत  धन्यवाद  निशा जी

nishamittal के द्वारा
May 19, 2012

मीनू जी आपको सार्थक मुद्दा उठाने के लिए साधुवाद.

akraktale के द्वारा
May 18, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार, बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आपने जरूर ही विधवाओं को सम्मान मिलना चाहिए उन्हें भी फिर खुशहाल जिंदगी जीने का हक़ है वह चाहे दुबारा शादी करके प्राप्त हो या फिर उसी परिवार से जुड़े रहकर प्राप्त हो. हमारे समाज में बहुत अधिक समस्या तो परिलक्षित नहीं होती. हाँ जहां महिला सक्षम नहीं है वहां परिवार उसे बोझ समझ लेता है. अब ऐसे मामले भी कम ही देखने को मिलते हैं. किन्तु किसी एक नारी पर भी जुल्म हो यह ठीक नहीं है.इसलिए इस जाग्रति को घर घर तक पहुँचना हमारा फर्ज है. साधुवाद.

    jlsingh के द्वारा
    May 19, 2012

    आदरनीय अशोक जी के विचारों के साथ पूर्ण सहमती! इस सामाजिक बुड़ाई को जड़ से समाप्त करने की जरूरत है!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 19, 2012

    आदरणीय अशोक जी और जवाहर भाई के विचारों से पूर्ण सहमती !

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    रक्ताले जी पहले  धन्यवाद  ,अभी कुछ  दिन  पहले  ही  इसी मंच  की ताजी खबरों  में वृंदावन  की विधवाओं के बारे में पढा था तभी से कुछ  इनके हितार्थ  लिखने  की इच्छा  जागी,मैं  मानती हुं ऐसी  समस्याएं कम  है पर उनकी भी संख्या अच्छी खासी  है गांवों में  ये अभी भी हर तरह से प्रताङित की जाती है, वैसे भी आपने ये उचित कहा कि किसी एक पर भी जुल्मना होने  पाए.,आपका हार्दिक आभार

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यवाद  जवाहर जी

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका भी धन्यवाद शशि जी

krishnashri के द्वारा
May 18, 2012

महोदया , सादर , आपके विचार सराहनीय हैं . मैं समर्थन करता हूँ .

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका  आभार   विचारों को समर्थित  करने के लिए  कृष्णाश्री जी

omdikshit के द्वारा
May 18, 2012

मीनू जी, नमस्कार. आप के विचार ,समर्थन योग्य हैं.

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    हार्दिक  धन्यवाद  ओम जी

May 18, 2012

जिसे समाज ने विधवा का नाम दिया है,जिस इंसान ने उसकी जिंदगी में जाने कितने रंग भरे,उसी की चिताग्नि में उस स्त्री की सारी खुशियां,सपने और रंगों को स्वाहा कर दिया जाता है,रह जाती है तो बस सफेदी में लिपटी,एक अभागी,लाचार सांस लेती एक नारी देह…,एक तरफ तो अपनी वैवाहिक खुशियों को खोकर यूंहि वो स्तब्ध होती है और उसी परिस्थिति में समाज उसपर वर्जनाओं की एक लंबी श्रृंखला थोप कर हर पल ये एहसास दिलाना चाहता है कि वो अधूरी हो चुंकी है और इस अधूरेपन में उसकी साथी सुखद यादें नही प्रतिपल दुखी करने वाले कायदों की फेहरिश्त होगी,जो उसके घावों को भरने तो नही ही देगी हां नासूर जरूर बना देगी………..पूजा-पाठ,धार्मिक कर्मकांड करने और समाज से यथासंभव दुरी बनाए रखने की ताकीद के साथ,वस्त्रों,आचार-विचार ही नही खाने-पीने तक में सादगी का पालन करने का आदेश……..,”कहां है समाज की संवेदनाएं” मारा कर्तव्य है कि अपनी बिरादरी,समाज,आसपास,परिवार जहां भी हमें ऐसी अबलाएं दिखें हम उनके मन से ना केवल परिवार पर बोझ बन जाने के पूर्वाग्रह को निकालें बल्कि उम्र और काबिलियत के हिसाब से उन्हे जीवन को चलायमान बनाए रखने की दिशा दिखाएं ताकि अन्य ओर ध्यान लगा कर उसकी जिंदगी के बांकी दिन भी संवरे और अपनी अपूरणीय क्षति को भूलने का बहाना भी वो पा सके-ये हमारा नैतिक कर्तव्य भी है और मानवता का एक प्रमुख धर्म भी……बस समाज की दयादृष्टि के साथ साथ मानसिक और भावनात्मक संबल चाहिए उसे………

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    अनिल  जी, दो शब्द  अपनी  ओर  से भी कह देते तो अच्छा लगता,ब्लॉग  पर आए  धन्यवाद  आपका

    May 21, 2012

    माफ़ करियेगा दीदी ……मैं किसी को अच्छा लगाने के लिए कमेन्ट नहीं देता……बहुत से लोग ऐसे है जो किसी की पोस्टिंग को पढ़ने की बजे, कमेन्ट देकर आगे बढ़ जाते हैं परन्तु उनको किसी के कमेन्ट पढ़ना अच्छा लगता है…..ऐसे मैं यदि मैं अपना कमेन्ट लिखता तो आपका यह खुबसूरत सन्देश आपकी उनतक पहुचने से रह जाता ……! वैसे भी आज तक मैं खुद को नहीं जान पाया तो भला दुसरे मुझे जानकार क्या करेंगे…..!

    minujha के द्वारा
    May 22, 2012

    अनिल जी,सचमुच  आपको  समझपाना मुश्किल  है पर अगर  आप दीदी कह रहे है तो पहले एक सौ  बार सोचिए,क्योंकि आप  जिस  जुनून में बढ रहे है,उसमें ये रिश्ते आपकी पगबाधा बन सकते  है….,कहने को बहुत  कुछ  है पर…….  अब अगली  बार

    May 22, 2012

    दीदी, अभी आपने माना न कि मुझे समझाना बहुत मुश्किल है……इस संसार ऐसी बहुत सी चीजे हैं जिसको समझाने का मतलब है अपना वक्त जाया करना……मैं कोई भी काम आगे बदहने के लिए नहीं करता हूँ..बल्कि उस असते को रोकने के लिए जो सत्य का चोला पहने खड़ा है…..और मेरा अपना अन्दांज है बैटन का रखना….आपकी और यमुना जी की शैली सचमुच ज्ञानवर्धक होती है और निश्चय ही मेरे जैसे लोगों और बच्छों के लिए उपयोगी है………..परन्तु जहाँ घमंड और गलतफहमी से चूर-चूर लोगों की विचार धारा अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करके ऐसी सम्मान और मर्यादा की बात करती हो जो हवा के एक झोके से तहस-नहस हो जाती है तो वहां सिर्फ मेरी ही शैली की जरुरत है.आज के दुनिया में जो सम्मान और मर्यादा दिख रहा है, उसे ख़त्म करना अति ही आवश्यक है औरउसके लिए कुछ हटकर शैली अपनानी ही पड़ेगी……आप अभी दुनिया के असिलियत को घर के अन्दर बैठकर देख रही हैं जब खुद उसका सामना करेंगी तो पता चलेगा कि स्थिति कितनी भयावह है. …….आज से ४ साल से पहिले मैं भी आप ही की तरह विचार रखता था….पर अब जो हकीकत का सामना किया हूँ तो पता चला है कि सोच और सच्चाई में कितना अंतर होता है…. पर ऐसा नहीं की आपकी शैली की जरूरत नहीं…..बहुत ही आवश्यक है पर वो सिर्फ मेरे जैसे इंसानों के लिए…….!

May 18, 2012

सही कहा आपने मीनू दीदी…सभी को जागरूक होना होगा तभी पूरा सुधार आएगा…

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    गौरव भाई ,नई पीढी इस बात को सम झ रही है लिखना सफल  रहा,धन्यवाद

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 18, 2012

मीनू जी, सादर ! आज भी तथाकथित इस सभ्य समाज में ऐसी घृणित मानसिकता पलती है जो नितांत निंदनीय है ! विचारोत्तेजक आलेख के लिए बधाई !

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    आचार्य  जी,समर्थन के लिए हार्दिक  आभार

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 18, 2012

नारी के सहनशीलता की परीक्षा की पराकाष्ठा नही तो और क्या है ये जहां वो अपना सहारा भी खोती है और नियमों के बोझ तले दबकर अपनी ख्वाहिशें भी…,सतीप्रथा भले ही खत्म हो गईं हो,.. हर पल जलाने वाली दुश्वारियां तो उससे भी बदतर हैं,यही नही पीङिता की आयु कम हो या ज्यादा..आक्षेपों का जो सिलसिला चल पङता है सार्थक और सुन्दर सीख देता हुआ आलेख मीनू जी ..चिंता का विषय तो है ही ..सब को खुश रहने और जीने का अधिकार हो कोई दिल दुखने वाली बातें न हो समर्थन और प्यार मिले तो आनंद और आये .. आभार भ्रमर ५

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    भ्रमर जी यही तो सबको समझाना है,आभार

चन्दन राय के द्वारा
May 18, 2012

मीनू जी , आप सदेव इक सुन्दर और संवेदनशील विचारो के साथ रूबरू होती हैं , सचमुच आज समाज असंतुलन की परिपाटी पर खड़ा है , गाँव में विधवा घुट कररह जाती है , और शहर में भूखे भेड़िय उसके जिस्म को नोचने को तयार रहते है , dekhiy इसी शभ्य समाज में विधवा को झूटी माँग भर कर अपनी लाज बचानी पड़ती है , सुन्दर और गंभीर अनुकरणीय , विचारशील आह्वाहन पर हम सब आपके साथ हैं

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यवाद चंदन जी इसी सहयोग की आवश्यकता  है


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