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ख्वाहिश ही रही

Posted On: 24 Apr, 2012 Others में

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किसी के मुकद्दर बन तो गए आखिर ,पर
हाथों की लकीर बन पाने की ख्वाहिश ही रही
चाहतें तो पुरी कई सारी हुईं,पर हर
सोच को मुकम्मल कर पाने की ख्वाहिश ही रही
बदले कई दफा रुहानी हयात अपने, पर
खुदाई सी पाकियत पाने की ख्वाहिश ही रही
उलझे अपने ही जालों में इस कदर कि
खुद को ढूंढ पाने की ख्वाहिश ही रही
किस्मत ने इम्तहां लिए इतने सारे कि
सर उठाकर जी पाने की ख्वाहिश ही रही
लम्हा लम्हा फिसलती निकल गई जिंदगी जाने कब
किसी की खातिर मर पाने की ख्वाहिश ही रही
भीङ बनके जोशीले अल्फाजों को दुहराया था मैने
पर खुद पर काबु पाने की ख्वाहिश ही रही
एक निर्लोभी,बैरागी का चोला ओढा था कभी
पर गोया,एक ही चेहरा निभा पाने की ख्वाहिश ही रही
आदमजात होकर भी तकदीर से लङी थी मैं
पर अपना ही भाग्यविधाता बन पाने की ख्वाहिश ही रही
यही थे वे “सपने “ जो खुली आंखों ने थे देखे
इनको मुट्ठी में कस पाने की ख्वाहिश ही रही
आते रहे जाते रहे ,अपनी जमीं बनाते रहे
आसमां से लाकर इन्हे वहां बसा पाने की ख्वाहिश ही रही
बस एक ख्वाहिश ही रही

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62 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मनु (tosi) के द्वारा
June 10, 2012

वाह !!! वाह !!! मीनूजी बहुत ही बढ़िया , कभी किसी को मुक्कमिल जहाँ नहीं मिलता … सादर !!

    minujha के द्वारा
    June 13, 2012

    धन्यवाद मनु जी

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
May 14, 2012

नमस्कार मीनू जी | शानदार लेखन |

    minujha के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यवाद आपका विवेक जी

yamunapathak के द्वारा
May 2, 2012

तुम्हारा लेख प्यार तो ……दो बार पढ़ा मैंने बहुत ही सही अभिवक्ति है.और एक बात यह की बहुत दिनों बाद प्रतिक्रियाएं सुब्मित भी हो पा रही हैं तुम्हारे नए लेख का इंतज़ार है यमुना

yamunapathak के द्वारा
May 2, 2012

हेल्लो मीनू.कई दिनों से इस ब्लॉग पर प्रतिक्रिया लिखना चाह रही थी ये मुझे बहुत अछा लगा और एक शेर याद आया हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पर दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान पर बहुत कम निकले

    minujha के द्वारा
    May 3, 2012

    एक ही पोस्ट पर दो बार आपकी प्रतिक्रिया पाना सुखद एहसास रहा, आपका हार्दिक धन्यवाद

drbhupendra के द्वारा
April 28, 2012

सुन्दर भाव…..

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    भूपेन्द्र जी ब्लॉग पर आगमन और सकारात्मक विचार दोनो के लिए धन्यवाद आपका

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 27, 2012

बहुत सुन्दर भावाभियक्ति,मीनू जी. उलझे अपने ही जालों में इस कदर कि खुद को ढूंढ पाने की ख्वाहिश ही रही किस्मत ने इम्तहां लिए इतने सारे कि सर उठाकर जी पाने की ख्वाहिश ही रही लम्हा लम्हा फिसलती निकल गई जिंदगी जाने कब किसी की खातिर मर पाने की ख्वाहिश ही रही बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    राजीव जी आपके विचारों की प्रतिक्षा रहती है इन पंक्तियों को मान देने के लिए आपका धन्यवाद

vinitashukla के द्वारा
April 27, 2012

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति. अच्छी पोस्ट पर बधाई मीनू जी.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका विनीता जी

alkargupta1 के द्वारा
April 26, 2012

मीनू जी , जैसे ही एक ख़्वाहिश पूरी होती है कि दूसरी ख़्वाहिश का जन्म हो जाता है फिर तीसरी….चौथी….जीवन पर्यंत यह सिलसिला चलता रहता है….शायद पूर्ण नहीं हो पाती है……बहुत ही बढ़िया भाव व्यक्त किये हैं……अति सुन्दर रचना !

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    शत प्रतिशत सहमत हुं आपसे अल्का जी और शायद इंसान के जिंदा रहने की भी वजह यही है,आपके विचार मिले बहुत अच्छा लगा

akraktale के द्वारा
April 26, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार, अतिशय सुन्दर रचना. मै तो बस यही कह सकता हूँ. हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता.बधाई.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता.सच है पर ख्वाहिशे कहां कभी हारती है,शायद कभी ,शायद कहीं की तंद्रा इन्हे ये समझने देती ही नही.प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 26, 2012

किस्मत ने इम्तहां लिए इतने सारे कि सर उठाकर जी पाने की ख्वाहिश ही रही भावपूर्ण रचना मीनू जी . आभार

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    जयप्रकाश जी बहुत बहुत धन्यवाद पसंद करने के लिए

krishnashri के द्वारा
April 26, 2012

महोदया , जीवन के सत्य को उकेरती पंक्तियाँ , भावों के चरम बिंदु को छूती रचना , बधाई शुभकामना .

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    धन्यवाद कृष्णाश्री जी आपसे मिलने वाले विचार लिखने के उत्साह को द्विगुणित कर देते है,दिल से आपका शुक्रिया 

yamunapathak के द्वारा
April 26, 2012

मीनू हर पंक्ति सुन्दर अब इस पर मैं एक मशहूर शेर अर्ज़ न करूँ तो मेरा शेरोन के प्रति जुनून ही व्यर्थ तो ज़नाब अर्ज़ किया है हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पर दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले चलो अब वाह!इरशाद तो बोलो फिर अगला शेर अर्ज़ करूंगी.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    मुझे लगता है आपकी लेखनी के लिए इरशाद शब्द भी छोटा है,कम समय में ही आपने अपनी जिन विधाओं के दर्शन कराएं है,उसके लिए शब्द नही मेरे कोष में आपके हर शेर के पहले इरशाद,हार्दिक धन्यवाद

sonam के द्वारा
April 26, 2012

नमस्कार मैम अति सुंदर कविता मीनू मैम…….! सादर

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    धन्यवाद सोनम जी

omdikshit के द्वारा
April 26, 2012

मीनू जी, मै सरिता जी की प्रतिक्रिया से सहमत हूँ…….ख्वाहिश पूरी हो जाय,तो महत्वहीन हो जाती है.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    ओम जी आपकी बात सत्य है,पर इसका एक पक्ष और है ,ख्वाहिशें पूरी होती है तभी हमारी चाहतें और बढती है……यूं कहुं तो तभी हम आगे बढने का सोचते है,वरना जिंदगी बस उन्ही चंद ख्वाहिशों के आगे पीछे करते खतम हो जाती है हार्दिक आभार आपका

sinsera के द्वारा
April 25, 2012

प्रिय मीनू जी, नमस्कार, आप ने वो किस्सा तो सुना ही होगा .. ख्वाहिश ने ज़िन्दगी के आँचल में सर रख कर पूछा …., मैं पूरी कब हूँगी ???? ज़िन्दगी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया …, जो पूरी हो जाए वो ख्वाहिश ही क्या …..

    sonam के द्वारा
    April 26, 2012

    बहुत खूब मैम ……..! ख्वाहिश ने ज़िन्दगी के आँचल में सर रख कर पूछा …., मैं पूरी कब हूँगी ???? ज़िन्दगी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया …, जो पूरी हो जाए वो ख्वाहिश ही क्या …..

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    सरिता जी कहानी तो सुनी थी,पर क्या करें मन कहां कोई तर्क मानता है,उसने तो बस उङना ही सीखा है आपने विचार दिए,धन्यवाद आपका

Mohinder Kumar के द्वारा
April 25, 2012

मीनू जी, सब कुछ पा कर भी कुछ और पाने की चाह मनुष्य की फ़ितरत है. इन ख्वाहिशों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता. किंचित मनुष्य की प्रगति का कारण भी यही है कि जहां वह आज है उससे कहीं आगे जाना चाहता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि उसकी यह ख्वाहिश कभी कभी उसके लिये उदासी का या तवाही की कारण बन जाती है… सुन्दर भाब भरी रचना…. लिखते रहिये.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    मोहिंदर जी,आपकी हर बात सही है…..,यही हमारी प्रगति का मार्ग भी बनाते है तो कभी तबाही का कारण भी बनते है आपका स्वाहत ब्लॉग पर ,सहयोग बनाए रखें

nishamittal के द्वारा
April 25, 2012

बहुत सुन्दर रचना मीनू जी, निम्न पंक्तियों ने बहुत प्रभावित किया. एक निर्लोभी,बैरागी का चोला ओढा था कभी पर गोया,एक ही चेहरा निभा पाने की ख्वाहिश ही रही आदमजात होकर भी तकदीर से लङी थी मैं पर अपना ही भाग्यविधाता बन पाने की ख्वाहिश ही रही

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आपको ये पंक्तियां पसंद आई,जानकर अच्छा लगा धन्यवाद आपका

jlsingh के द्वारा
April 25, 2012

लम्हा लम्हा फिसलती निकल गई जिंदगी जाने कब किसी की खातिर मर पाने की ख्वाहिश ही रही पक्तियां सभी लाजवाब हैं किन्हें अपना बनाऊं ये भी ख्वाहिश ही रही. बहुत ही सुन्दर मोतियों से गुंथा ये हार !!!!!! नमन आपको कितनी बार करूँ यह भी ख्वाहिश ही रही

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    इतना कहकर लज्जित ना करें जवाहर जी रचना आपको पसंद आई,हार्दिक आभार

कुमार गौरव के द्वारा
April 25, 2012

आदरणीया मीनू जी बहुत कुछ कह दिया आपने अपनी इस रचना के माध्यम से…बधाई…

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आपका धन्यवाद गौरव जी

dineshaastik के द्वारा
April 25, 2012

आदरणीय  मीनू जी,  यह केवल  कविता नहीं है, बल्कि इसमें एक  ऊँचा दर्शन है। महान  संदेश  को प्रकाशित  कर रही है रचना। भाव और  बुद्धि दोनों का सुन्दर समावेश….बधाई….

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    दिनेश जी आपने कविता के उद्देश्य को समझ कर रचना का मान बढाया,आपका हार्दिक आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 24, 2012

आदमजात होकर भी तकदीर से लङी थी मैं पर अपना ही भाग्यविधाता बन पाने की ख्वाहिश ही रही आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम क्या शब्द भाव ……..क्या मधुर मार्मिक चित्रण ………….. बहोत ही सुन्दर अभिव्यक्ति………………….बस एक ही चीज की कमी है जो समझ नहीं आ रही आपने क्यूँ नहीं की रचना के सौन्दर्य पर आपने क्यूँ काम नहीं किया …………ना चित्र ना कलर बिना मेकप के तो कटरीना भी राखी सावंत लगेगी……………….

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आनंद भाई ,आपने इतना सोचा अच्छा लगा, पर अब एक सच्चाई बताना चाहुंगी आपसे,मेरी प्रकृति बहुत संकोची है,अपनी हर रचना में मुझे खुद एक सौ कमियां नजर आती है,पर आपलोगो का प्यार पाने की इच्छा उस कमी को दरकिनार होने पर मजबूर कर देती है पर संकोचवश उसकी साज -सज्जा का ध्यान नही रख पाती,पर अब…… आगे से ध्यान रखुंगी,शुक्रिया ध्यान रखने का

April 24, 2012

सादर! लम्हा-लम्हा फिसलती निकल गयी जिंदगी जाने कब , किसी के खातिर मर पाने की ख्वाइश ही रही………..हार्दिक आभार.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    पंक्तियों को पसंद करने के लिए आपका धन्यवाद अलीन जी

shashibhushan1959 के द्वारा
April 24, 2012

आदरणीय मीनू जी, सादर ! विचार-सागर की अतल गहराइयों से निकाले गए मोती जैसी आभा बिखेरती रचना ! . “”"आते रहे जाते रहे ,अपनी जमीं बनाते रहे आसमां से लाकर इन्हे वहां बसा पाने की ख्वाहिश ही रही बस एक ख्वाहिश ही रही”" अनुपम ! शानदार !

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आपकी सराहना पाकर गर्व का एहसास होता है शशि जी मार्गदर्शन भी किया करें ,आभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 24, 2012

सपने तो सपने होते हैं | मुश्किल से अपने होते हैं || सुन्दर प्रस्तुति , बधाई !! मीनू जी !!

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    धन्यवाद आचार्य जी.

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 24, 2012

चाहतें तो पुरी कई सारी हुईं,पर हर सोच को मुकम्मल कर पाने की ख्वाहिश ही रही आदरणीय मीनू ji ….. सादर प्रणाम ! हर किसी को नहीं मिलता है मुक्कमल जहाँ यहाँ पर जिन्दगी में ….. आपने रूहानियत की बात भी की है तो उस लिहाज से कहना चाहूँगा की किसी भी चीज की इच्छा न करना + रखना ही सब कुछ पाना है :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    रूहानियत की बात नहीं की राजकमल जी,उसे पाना भी ख्वाहिशों के फेहरिश्त में शामिल है,वो हासिल हो जाए तो फिर सारी समझ खुदबखुद आजाएगी,आपकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी लगी,आना जाना बनाए रखें,आभार

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 24, 2012

आदरणीय मीनू जी सादर प्रणाम सुन्दर, भाव-पूर्ण अभिव्यक्ति आभार……..

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    अजय जी,धन्यवाद आपका

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 24, 2012

भीङ बनके जोशीले अल्फाजों को दुहराया था मैने पर खुद पर काबु पाने की ख्वाहिश ही रही एक निर्लोभी,बैरागी का चोला ओढा था कभी पर गोया,एक ही चेहरा निभा पाने की ख्वाहिश ही रही आदमजात होकर भी तकदीर से लङी थी मैं पर अपना ही भाग्यविधाता बन पाने की ख्वाहिश ही रही मीनू जी सुन्दर ..ये ख्वाहिशें भी बड़वानल हो गयी हैं कभी पूरी ही नहीं होतीं कितना अच्छा होता की सपने सच भी होते कुछ कुछ ….आप की प्यारी ख्वाहिशें सब पूर्ण हों ..दुआ है भ्रमर ५

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आपकी दुआओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद भ्रमर जी,बस यूंहि स्नेह बनाए रखें

vikramjitsingh के द्वारा
April 24, 2012

मीनू जी, सादर प्रणाम, ”हजारों ख्वाहिशें ऐसी, कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां, मगर फिर भी वो कम निकले…….”

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    इन पंक्तियों से ही तो ख्वाहिशे बढाने की इजाजत ली है विक्रम जी,धन्यवाद

Rishabh verma के द्वारा
April 24, 2012
    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    अवश्य पढूंगी,धन्यवाद

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
April 24, 2012

आदमजात होकर भी तकदीर से लङी थी मैं पर अपना ही भाग्यविधाता बन पाने की ख्वाहिश ही रही यही थे वे “सपने “ जो खुली आंखों ने थे देखे इनको मुट्ठी में कस पाने की ख्वाहिश ही रही मीनू झा जी- नमस्कार सपने – ख्वाहिशें तभी पूरी होती है जब लक्ष्य का निर्धारण किया जाता है. भाव प्रधान रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिये. आप मेरे ब्लॉग पर मौजूद अन्य रचनाओं को भी पदियेगा.

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    अंकुर जी आपकी बात से सहमति रखते हुए शुक्रिया कहना चाहुंगी.आपकी बधाई भी सहर्ष स्वीकार है.

चन्दन राय के द्वारा
April 24, 2012

मीनू जी , आपकी इस सुन्दर रचना की शान में दिल का दर्द जाग गया तो हमने भी सोचा लिख दे जो ख्वाइश ही रही नहीं मिलते हो तुम तो सब हमदर्द है मेरे तुमे अपना हमदर्द कह सके ,ये खाविश ही रही

    minujha के द्वारा
    April 28, 2012

    आपके सुंदर भाव बहुत अच्छे लगे चंदन जी धन्यवाद आपका


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