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ये बंधन तो प्यार का बंधन है....

Posted On: 15 Apr, 2012 Others में

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सहोदर ,संबंध सिर्फ उदर का नहीं,जन्म का नहीं,रक्त का नहीं,सांसों का नहीं,मन का मन से भी है,लगभग एक जैसे सारे तत्वों से निर्मित दो प्राणी जिनका स्वर्णिम समय, बचपन एक ही छत के नीचे,एक साथ पलता बढता है,वो परस्पर का प्यार, अगले के दर्द का बराबर का एहसास,वो एक दुजे का पहला सहारा बनने की भावना,…., कहीं तिरोहित हो गईं,या इनकी उम्र बचपने तक ही सिमट गई है ??,मैं उस गरिमामयी रिश्ते की बात कर रही हुं जिसने ना जाने हमारे इतिहास के कितने सारे पन्ने रचे……..,पर आज हम अपने भाई-बहन के साथ बिताया समय जाने कहां समय के साथ भुलाते जाते है और उन्हे बस अपने एलबम तक सीमित कर देते है,और अगर मतभेद ज्यादा गहरा गया तो उन मासूम पलों की यादों वाले पन्ने को ही टुकङे टुकङे कर नफरत की आग के हवाले कर डालते है आखिर कहां जा रहे है हम……??.
माना समय बदला है पर रिश्ते तो नही बदले,प्रतिद्वंदिता कहां नही होती पर क्यों बचपन में एक दुजे से आगे बढने की होङ,समय के साथ साथ ईर्ष्या,द्वेष,क्षोभ,कुंठा,हीनता,असंतोष और नाराजगी जैसे नाकारात्मकभावो में तब्दील होती जाती है और अंतत: रास्ते ही नहीं बंटते दिल भी बंट जाते है,और रत्ती भर का भी मलाल नही होता हमारे अंदर.आज माता-पिता अपने जीवनपर्यंत भरसक प्रयास कर इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश करते है,पर उनके बाद ये रिश्ते बस नाम के रह जाते है अपने ही खुन से ऐसा मतभेद आखिर क्यों ??
हम आपस में भाईचारा निभाने की बात करते है,पङोसी से अच्छे संबंध बनाने में यकीन रखते है,समाज में सामाजिक का विशेषण हमें लुभाता है,हर जगह हम सामंजस्य़ स्थापित करने को तत्पर दिखतें है,पर फिर वही अपने खुन की बात आते ही हम कतई झुकने को तैयार नही होते,जबकि अपने देश में दुश्मन को भी गले लगाने की प्रथा है फिर अपने ही अग्रज-अनुज से ठन कर भला क्या हासिल होने वाला है…???
क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है कि माता-पिता के बाद इस पृथ्वी पर जो निकटतम रिश्ता है वो अपने भाई बहन का ही है,क्या ये सच नही कि एक सच्चा रिश्ता बनाने में हम वर्षों गंवा देते है फिर भी उसकी विश्वसनियता अपने भाईबहन की बराबरी नही कर सकती,क्या ये सच नही कि अक्सर हमारा झुठा अहम,ऊंच नीच की जद्दोजहद और झुककर छोटे हो जाने की बचकानी दलील ही इन रिश्तों के पटाक्षेप का कारण बनती आई हैं और हम ना चेते तो पता नही और कितनी बार बनेंगी……..,तो अब आगे बढने का समय है . जर-जोरू-जमीन की घिसी पिटी लकीर को पीटना छोङ अब हमें संजोना होगा उस रिश्ते को जो अनमोल है ,जो हम और कहीं से हासिल नही कर सकते,जो हमारा अपना है, हमारा सगा है ,हमारा अक्स है, माना परिवार सिमट रहा है,इंसान के पास पति-पत्नी-बच्चों के बाद समय ही नहीं है,पर ये रिश्ते समय नही,प्यार मांगते हैं अपनापन मांगते है, हमारी दीवारें भले अलग हो,दिल तो जुङे हों ,शहर भी अलग हों तो क्या, आज संसाधन इतने विकसित हो चुके है कि हम बिना मिले भी एक स्वस्थ और मधुर रिश्ता कायम रख सकते है,ताकि
रिश्तों की ताजगी समय के साथ धूमिल ना होने पाए,हम भले वर्षों बाद मिले एक दुसरे से उसी प्यार से मिले जो संबंध की प्रगाढता बढा दें,वो साथ के चंद दिन अगली मुलकात तक हममें ऊर्जा भरते रहे,और हर पूर्वाग्रह से ऊपर उठ हम ये कह सकें – ये बंधन तो प्यार का बंधन है…

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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
May 2, 2012

बहुत खूब,आजकल ये समस्या थोड़ी और बढ़ गयी है जब से लड़कियों को पिता की संपत्ति पर हक मिल गया है पर आज भी कई बेटियाँ अपने हक से ज्यादा भाई के प्यार भरे रिश्तों को वरीयता देती हैं. जल्दी से कुछ और नया सा लिखो ,

jalaluddinkhan के द्वारा
April 22, 2012

रिश्तों को ताज़ा बनाने का प्रयास करती आपकी यह रचना सराहनीय है.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    धन्यवाद खान साहब.

चन्दन राय के द्वारा
April 21, 2012

मीनू जी, मुझे आप का आलेख पढ़ते पढ़ते यह गीत याद आ रहा है , ना जाने केसे पल में बदल जाते हैं ये दुनिया के बदलते रिश्ते , आप जब भी लिखती हैं , गहरा और संतुलित लिखती हैं

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    चंदन जी मेरे तो जो जी में आता है बस लिख देती हुं आप सबों की सराहना पाकर वो अच्छा बन जाता है हार्दिक धन्यवाद

sonam के द्वारा
April 19, 2012

नमस्कार मीनू जी बहुत खूब लिखा है आपने की रिश्तो को सिर्फ प्यार चाहिए……. लेकिन ये प्यार ही तो नहीं है महसूस करने के लिए ……..! वैसे तो सारी दुनिया में प्यार का ही बोलबाला है की मुझे उससे प्यार …………या उसे उससे प्यार है लेकिन ये प्यार है कहाँ ये समझ नहीं आता………! सुंदर आलेख के लिए बधाई ………….!!

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    सोनम जी आपकी प्रथम प्रतिक्रिया पाकर खुशी हुई प्यार कैसे नही है सोनम जी,हां इसके कुछ मायने जरूर बदले है.पर प्यार ना होता तो दुनियां कबकी खतम हो गई होती,सच बताईएगा क्या आपको इस मंच से प्यार नही है,….तो जब निर्जीव से इतना लगाव तो अपने तो अपने ही होते है,धन्यवाद आपका

yamunapathak के द्वारा
April 19, 2012

मीनू,आज बहुत दिनों बाद तुम्हे याद कर रही हूँ इस मंच पर ,ये लेख वाकई आज बिखरे रिश्तों की ओरे ध्यान दिलाता है .ये घृणा ,वैमनस्य की जड़ परवरिश और संस्कारों में भी कहीं ना कहीं अवश्य छुपी होती है.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    सच कहा आपने ,संस्कार भी इसके जिम्मेदार है जो हमे टूटने से बचा नही पाते,आभार आपका

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 17, 2012

आदरणीया मीनू दी , सादर नमस्कार , आपने तो सीधे ह्रदय को स्पर्श किया , सच हम घर से बाहर मित्रता निभाते रहते है पर एक माता -पिता के संतान होकर , बचपन के खुबसूरत पलों को तिलांजली देकर सिर्फ सवार्थ और इर्ष्या से वशीभूत होकर एक दुसरे से बातचीत तो दूर की बात है चेहरा भी नहीं देखना चाहते और अगर …… दिल को छु लेने वाले लेख के लिए आपको बहुत -२ बधाई

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    महिमा जी आप ब्लॉग पर आईं अच्छा लगा उपरोक्त इन्ही कारणों ने लिखने को विवश कर दिया,धन्यवाद आपका

yogi sarswat के द्वारा
April 17, 2012

आदरणीया मीनू जी सादर नमस्कार ! मधुर भाव से बंधे हुये खूबसूरत रिश्तों को सुन्दर संदेश देती हुई रचना। रिश्ते समय नही,प्यार मांगते हैं अपनापन मांगते है, हमारी दीवारें भले अलग हो,दिल तो जुङे हों ,शहर भी अलग हों तो क्या, आज संसाधन इतने विकसित हो चुके है कि हम बिना मिले भी एक स्वस्थ और मधुर रिश्ता कायम रख सकते है,बढ़िया और अलग विषय !

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद योगी जी

alkargupta1 के द्वारा
April 17, 2012

.प्यार की नींव पर टिके ये रिश्ते भी आज स्वार्थवश खोखले से होते जा रहे हैं……. अंतिम पंक्तियों में सुन्दर भावों द्वारा बहुत अच्छा सन्देश दिया है मीनूजी

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपकी सराहना पाकर मन हर्षित हुआ अल्का जी आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 16, 2012

आदरणीय मीनू दीदी, सादर प्रणाम बहोत दिनों बाद आपके लेख पर आया हूँ………….किसी कारण से व्यस्त था इन्शान जैसे जैसे बड़ा होता जाता है उसके अन्दर की भावना भी नष्ट होती जाती है……….और वह अपने जीवन में प्रक्टिकल होते होते इतना ज्यादा प्रक्टिकल हो जाता है की नजदीकी रिश्तों की समझ भी ख़त्म हो जाती है………..वैसे बहोत ही सुन्दर मुद्दा है यह और इसका उत्तर शायद कोई ना दे पाए………….आपको लेख के लिए बधाई

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपकी बात अक्षरश सत्य है आनंद जी ,धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
April 16, 2012

मीनू जी ,जिन्दगी में असली रिश्ता तो प्यार का रिश्ता ही है |आपने सही लिखा है उंच नीच ,अहम् ,ईर्षा,आदि इसकी गरिमा को धूमिल कर रहे है |प्यार के बंधन पर एक अच्छा आलेख ,बधाई

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपकी प्रतिक्रिया और समर्थन दोनो के लिए आपको दिल से धन्यवाद रेखा जी

nishamittal के द्वारा
April 16, 2012

भाई-बहिन का अनमोल रिश्ता आजीवन चलने वाला एक प्यारा बंधन है,परन्तु स्वार्थ के चलते आज इस रिश्ते में भी दरार आने लगी है,सुन्दर  भावप्रधान आलेख

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपकी सराहना और अच्छा लिखने को प्रेरित करती है आभार

dineshaastik के द्वारा
April 16, 2012

आदरणीया मीनू जी भाव से बंधे हुये खूबसूरत  रिश्तों को सुन्दर  संदेश देती हुई रचना। रिश्ते समय नही,प्यार मांगते हैं अपनापन मांगते है, हमारी दीवारें भले अलग हो,दिल तो जुङे हों ,शहर भी अलग हों तो क्या, आज संसाधन इतने विकसित हो चुके है कि हम बिना मिले भी एक स्वस्थ और मधुर रिश्ता कायम रख सकते है,

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आस्तिक जी

sinsera के द्वारा
April 16, 2012

प्रिय मीनू जी, बहुत भावुक लेख….. सच तो है, छोटी सी ज़िन्दगी में कैसी क्षणभंगुर चीजों की वजह से इन्सान भगवान के दिए हुए अटूट, अकूत मजबूत रिश्तों को तोड़ने लगता है..झूठी अकड़ में रहने वालों के लिए सार्थक उपदेश…बधाई….

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    सरिता जी सबकुछ जानकर भी जाने क्यों मन उसे स्वीकारना नही चाहता,विचारो के लिए धन्यवाद

April 15, 2012

रिश्तों की अहमियत को आपने बाखुदा व्यक्त किया है. यह सच है कि हम भगौलिक रूप से एक दुसरे के जितना करीब आते जा रहे हैं मानसिक रूप से उतना ही दूर होते जा रहे हैं…….ऐसे आपका यह लेख घनघोर अँधेरे में एक दीपक जैसा है ………………..हार्दिक आभार.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    April 15, 2012

    अनिल भाई के विचारों से सहमत.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    अनिल जी आपकी सुंदर प्रतिक्रिया पाकर बहुत अच्छा लगा,शुक्रिया आपका

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    अजय जी धन्यवाद

vikramjitsingh के द्वारा
April 15, 2012

वाह मीनू जी वाह, जब आपने कल हमारे ब्लॉग पर कमेन्ट दिया तो उसकी परिभाषा कुछ-कुछ उलझी सी लगी थी, लेकिन हमें कल ही समझ जाना चाहिए था कि ये ‘कमेन्ट’ नहीं, आपकी आने वाली रचना का ‘सार’ है……अति उत्तम, मीनू जी, बहुत ही सुन्दर और सार्थक शब्दों में पिरोई हुई एक ऐसी ‘माला’ जिसका हर मनका कुछ कहता है………..और जिसको अगर हर इन्सान पहन ले तो दुनिया से वैर-विरोध ही खत्म हो जाये…..सुन्दर अति सुन्दर…..

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    विक्रम जी,देर से ही सही आपने समझ लिया हमारे लिए बहुत है,आपके खूबसूरत विचारों के लिए मेरे पास शब्द नही,बस धन्यवाद कह देती हुं

ajayupadhyay के द्वारा
April 15, 2012

very well writen ,congratulation aap ne bahut acchi baat kahi hai aaj har aadmi bas apna hi pariwaar mai seemit ho kar rah gaya hai , aapni bibi apna baccha bas or un unmol risto ko bhool gayabhai jo bachpaan ke madhur yade ban kar rah gayi hai

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    अजय उपाध्याय जी ,ब्लॉग पर आकर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद

akraktale के द्वारा
April 15, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार, बिलकुल सही कहा आपने ये बंधन तो प्यार का बंधन है. और ये बंधन इतना मजबूत है की कभी टूटता भी नहीं है. किन्तु भौतिकतावादी युग में इसमें असमानता की एक दीवार इनको आपस में मिलने नहीं देती. बस.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    पर असमानता की इस दीवार को तोङने का सार्थक प्रयास भी तो हमें तो करना  ही है ना रक्ताले जी,,बहुत बहुत आभार आपका

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 15, 2012

मीनू झा जी, नमस्ते ! दुनिया गोल है | हार- थककर फिर एक दिन वहीं आना पड़ेगा जहाँ से हम चले थे | भावुक आलेख के लिए बधाई !!

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    ऐसी ही आशा हम सभी के मन में है आचार्य जी हार्दिक धन्यवाद

कुमार गौरव के द्वारा
April 15, 2012

मीनू जी सादर प्रणाम आपने बड़ी संवेदनशील बात कही है. आपका समर्थन करता हूँ. मीनू जी आजकल रिश्तों की मिठास सामाजिक-आर्थिक स्टेटस के पैरों तले रौंदी जा रही है. मैंने इस बात को महसूस किया है. एक जमाना था जब इन्सान अपने मामा, चाचा, बुआ इत्यादि को रिश्तों से याद रखता था मगर आज सिर्फ आर्थिक स्थिति से याद रखता है. आज हर चीज व्यवसायिक हो चुकी है. सुनने में थोडा बुरा जरूर लगता है लेकिन ये आज की एक कडवी सच्चाई है. किसी भी रिश्तेदार से मिलते समय मनुष्य सोचता है की – ये मेरे किसी काम आएगा की नहीं? इससे रिश्ते निभाने से मेरा क्या फायदा होगा? कहीं इससे रिश्ता रखने से मेरे सामाजिक मान-सम्मान में कोई कमी तो नहीं आएगी? कोई पूछ देगा की ये तुम्हारा कौन है, तो मैं क्या कहूँगा? इत्यादि. यही आजकल की दुनिया है और ऐसे ही रिश्ते रह गए हैं. भावावेश में कुछ ज्यादा लिख दिया हो तो क्षमा चाहता हूँ. छोटा भाई समझ के माफ़ कर दीजियेगा.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपने जितने सारे कारण बताएं है वो सभी सत्य है गौरव जी और रिश्तों के बिखरने का कारण भी,इसमें गलतमानने जैसा कुछ भी नही धन्यवाद आपका

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 15, 2012

बहुत सुन्दर आलेख.मीनू जी.आपकी पंक्तियाँ दिल को छूती हैं ….. ‘रिश्तों की ताजगी समय के साथ धूमिल ना होने पाए,हम भले वर्षों बाद मिले एक दुसरे से उसी प्यार से मिले जो संबंध की प्रगाढता बढा दें,वो साथ के चंद दिन अगली मुलकात तक हममें ऊर्जा भरते रहे,और हर पूर्वाग्रह से ऊपर उठ हम ये कह सकें – ये बंधन तो प्यार का बंधन है…’

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    हार्दिक धन्यवाद राजीव जी

jlsingh के द्वारा
April 15, 2012

मीनू जी, सादर अभिवादन! आपने बहुत ही भावनात्मक मुद्दा उठाया है. माता-पिता के बाद इस पृथ्वी पर जो निकटतम रिश्ता है वो अपने भाई बहन का ही है,क्या ये सच नही कि एक सच्चा रिश्ता बनाने में हम वर्षों गंवा देते है फिर भी उसकी विश्वसनियता अपने भाई बहन की बराबरी नही कर सकती! हमें अपने अहम को त्याग इस रिश्ते को जिन्दा रखना ही होगा. मैं तो यह कहूँगा की हमारा अन्दर का मन कभी भी ये नहीं चाहेगा की इसे दरकिनार कर दें, पर क्षणिक अहम के कारण इस अनमोल रिश्ते को गँवा बैठते हैं और जिन्दगी भर पछताते रहते हैं! इस भावनात्मक मुद्दे को उठाने के लिए आपको बधाई!

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आपने बहुत अच्छी बात कही जवाहर जी हमारा अन्दर का मन कभी भी ये नहीं चाहेगा की इसे दरकिनार कर दें, पर क्षणिक अहम के कारण इस अनमोल रिश्ते को गँवा बैठते हैं और जिन्दगी भर पछताते रहते हैं! आभार आपाका विचारों को बल देने के लिए

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 15, 2012

रिश्तों की ताजगी समय के साथ धूमिल ना होने पाए,हम भले वर्षों बाद मिले एक दुसरे से उसी प्यार से मिले जो संबंध की प्रगाढता बढा दें,वो साथ के चंद दिन अगली मुलकात तक हममें ऊर्जा भरते रहे,और हर पूर्वाग्रह से ऊपर उठ हम ये कह सकें – ये बंधन तो प्यार का बंधन है… स्नेही मीनू जी, शुभाशीष. बहुत सुन्दर प्रयास रिश्तों को बनाये रखने हेतु. हम तो नहीं तोड़ेंगे. वादा.

    minujha के द्वारा
    April 25, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी आपसे हमेशा इसी तरह समर्थन और प्रोत्साहन की आशा रहती है,हार्दिक आभार


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