मेरी लेखनी :मेरा परिचय

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ऐ पिता मेरे

Posted On: 23 Feb, 2012 Others में

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इस दुनियां से पहला परिचय मेरा
स्नेहिल वो स्पर्श तुम्हारा
गोद में ले अपना प्रतिरूप कहा मुझे
दमकता वो दर्श तुम्हारा
हर शय दे देने का वो वादा
सीधा ,सच्चा रूप वो सादा
हर बाधा खुद पर लेने की चाहत
मुस्कान मेरे चेहरे की, तेरी राहत
लङखङाए कदम तो थे पास मेरे
वो प्यारा सा साथ तुम्हारा
जिन्हे पकङ दुनियां देखा,सबकुछ सीखा
वो ममतामयी हाथ तुम्हारा
रोने के मायने , हंसने का कारण बतलाया
हर विधा का ज्ञान दिया
चरित्र का मतलब,सभ्यता-संस्कृति का महत्व
समझा,खुद पर अभिमान किया
जगत के रंग,मौसम के बदलाव को समझाया
गौरवमयी इतिहास के पन्नों से वाकिफ करवाया
धरती से प्यार करना,सबसे जुङते रहना
ये पाठ भी मुझे पढाया
नियंत्रित कर मन के पशु को मानव बनना भी
तो तुमने ही मुझे सिखाया
पुजा की राह दिखाई,आत्मतुष्टि की बात बताई
कहा-जहाँ कही दिल घबराए,राह नजर ना आए
ईश्वर के चरणों में शीश झुकाना
पल में बाधाओं से मुक्ति पाना
पर,अदृश्यता को अपनाने में,
इस छवि को कैसे झुठलाउं ?
जो श्रद्धा व्यवहारिक बनाने वाले के प्रति
मांस का लोथङा बना
बस जठर का बोध करा
भेजने वाले के प्रति
वो प्रेम भला कैसे उपजाऊं ?
शत शत नमन तेरा ऐ पिता मेरे
रोम रोम पर एहसान तेरा
रख पाउं हर पल मान तेरा
बस इतना सा अरमान मेरा
तेरे पदचिन्ह पर चल पाउं
तेरे जैसा मैं बन पाउं
बस तेरे जैसा मैं बन जाउं ।।

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rachna Varma के द्वारा
February 27, 2012

पिता को समर्पित यह कविता दिल को छूने वाली है धन्यवाद

    minujha के द्वारा
    February 28, 2012

    धन्यवाद रचना जी,प्रथम प्रतिक्रिया और सराहना दोनों के लिए

February 25, 2012

मीनू जी नमस्कार ! बहुत अच्छी अभिव्यक्ति पिता के लिए इस कविता के माध्यम से। दिल को छूती सुंदर रचना के बहुत बहुत बधाई !!

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    धन्यवाद सूर्या जी आपने सराहा अच्छा लगा आभार

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 24, 2012

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति,मीनू जी.पिता तो आदर्श के प्रतिरूप होते हैं.बच्चे उन्हीं का अनुकरण करना चाहते हैं.इसलिए तो आपने कहा कि …. रोम रोम पर एहसान तेरा रख पाउं हर पल मान तेरा बस इतना सा अरमान मेरा तेरे पदचिन्ह पर चल पाउं तेरे जैसा मैं बन पाउं सुन्दर पंक्तियाँ.

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    बिल्कुल सही राजीव जी मै तो यही अभिलाषा रखती हुं कि अपने पिता सा ना भी बन पाई,उनके व्यक्तित्व का अंश भी पा लुं तो जीवन कृतार्थ हो जाए,धन्यवाद आपका विचार देने के लिेए

mparveen के द्वारा
February 24, 2012

सुंदर प्रस्तुति मीनू जी …. शत शत नमन तेरा ऐ पिता मेरे रोम रोम पर एहसान तेरा रख पाउं हर पल मान तेरा बस इतना सा अरमान मेरा तेरे पदचिन्ह पर चल पाउं तेरे जैसा मैं बन पाउं बस तेरे जैसा मैं बन जाउं ।।

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया परवीन जी आपका रचना को पसंद करने के लिए

February 24, 2012

सादर नमस्कार! पिता के प्रति कृतज्ञता को दर्शाती हुई रचना…..प्रशंशनीय.

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    आपका धन्यवाद अलीन जी

shashibhushan1959 के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीय मीनू जी, सादर ! बहुत सुन्दर एवं कुछ विद्रोही विचारों से भरी काव्य रचना दिल को छू गई ! “मांस का लोथङा बना बस जठर का बोध करा भेजने वाले के प्रति वो प्रेम भला कैसे उपजाऊं ? शत शत नमन तेरा ऐ पिता मेरे !”"” . आज सुबह स्वयं मेरे मन में “पिता” पर कुछ लिखने का विचार आया ! पता नहीं क्यों इस रिश्ते पर बहुत कम रचनाएं मिलती हैं. आदरणीय मीनू जी, आपको और आपकी लेखनी को मेरा नमन !!

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    शशिभूषण जी आपने इतना सम्मान दे दिया की मन भर आया,ये मेरा सौभाग्य है कि मेरे परमपिता के प्रति विद्रोही विचारों ने आपके दिल को छू लिया ,आभार 

sadhana thakur के द्वारा
February 24, 2012

बहुत खूब मीनू ,खुशनसीब हो तुम ,इस बात की तो मैं प्रत्यक्ष प्रमाण हूँ ..बहुत अच्छी भावाव्यक्ति ……

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    सच कहा आपने,आपने तो देखा ही है,आपने भावों  को सराहा लिखना सफल हुआ,बहुत बहुत आभार

yogi sarswat के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीय मीनू जी सदर नमस्कार ! मैं आपकी कविता को कई बार हित कर चूका हूँ किन्तु किसी टेक्निकल प्रॉब्लम की वज़ह से खुल नहीं प् रहा था ! मैं शायद हिंदी में प्रथम बार पिता पर लिखी हुई इतनी सुन्दर कविता पढ़ रहा हूँ ! यूँ पिता को हमने हमेशा एक अनुशाशन सिखाने वाला और फ़र्ज़ पूरे करने वाला व्यक्तित्व ही मन है कभी सोच्गा ही नहीं की उसके अन्दर भी दिल होता है जो अपने बच्चों के लिए धड़कता है अलग और विशिष्ट विषय पर लिखी हुई सुन्दर भावों से सजी कविता के लिए हार्दिक धन्यवाद !

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    आपने इतना सराहा योगी जी,इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

tosi के द्वारा
February 24, 2012

मीनूजी ! नमस्कार … पिता का पुत्री के प्रति अनुराग तो कई बार देखा है ,पर पुत्री का उन्हे सप्रेम आभार व्यक्त करना सचमुच अच्छा लगा … बधाई

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    पूनम जी आपकी प्रथम व सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 24, 2012

पिता के प्रति अपनी भावनाओं का सुन्दर प्रस्तुतिकरण है आपकी यह कविता मीनू जी।  साभार,

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    हार्दिक धन्यवाद आपका वाहिद जी

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 24, 2012

मीनू दी, प्रणाम आपके कविता को क्या कहूँ अक्सर लोग माताओं के बारे में लिखा करतें है किन्तु पिता के बारे में नहीं कह पाते जो भी कारण हो आपने बहुत ही निर्मल ढंग से अपने कविता को रखा है और सुन्दरता से इसे प्रदर्शित किया है आपका धन्यवाद आपने इसे कविता में भी क्यूँ नहीं पोस्ट किया

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

     भाई मेरे मैने भी ये बात गौर की थी ये रचना उसी का परिणाम है,वैसे भी मैं अपने पिता के ज्यादा निकट हुं सो लिखने की इच्छा हुई,अगली बार से तुम्हारी बात का ध्यान रखुंगी

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    आपकी जगह तुम्हारी लिख दिया है आशा है अन्यथा नही लेंगे

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    February 25, 2012

    प्यार भरे शब्दों को अन्यथा नहीं लिया जाता ये बात भले अन्यथा ले रहा हूँ

vinitashukla के द्वारा
February 24, 2012

पिता के प्रति बहुत ही सुन्दर और मन को छू जाने वाले उदगार. अच्छी पोस्ट पर बधाई मीनू जी.

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका विनीता जी

alkargupta1 के द्वारा
February 24, 2012

मीनू जी , पिता का अस्तित्त्व बड़ा ही महान है….हर पल हर साँसों में कठिन से कठिन विपदा में भी साथ ही रहता है…..अति सुन्दर हृदय स्पर्शी भावाभिव्यक्ति !बधाई

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    आभार आपका अल्का जी पिता का अस्तित्व महान होता है सच कहा आपने

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीया मीनू जी, बहुत ही अच्छी और विचारणीय रचना….बहुत पसंद आई मुझे आकाश तिवारी

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    धन्यवाद आकाश जी रचना को पसंद करने के लिए और ब्लाँग पर आने के लिए भी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीया महोदया , सुप्रभात शत शत नमन तेरा ऐ पिता मेरे रोम रोम पर एहसान तेरा रख पाउं हर पल मान तेरा बस इतना सा अरमान मेरा तेरे पदचिन्ह पर चल पाउं तेरे जैसा मैं बन पाउं बस तेरे जैसा मैं बन जाउं ।। करते जो नित प्रति वंदन अपने मात पिता के चरणों का हो जाता सुखी उनका जीवन कष्ट हरे वो जन जन का बढे मान सम्मान कुल का वे ईश्वर सम बन जाते हैं शेष न रहती कोई कामना भवसागर से तर जाते हैं. उत्क्रष्ट. बधाई.

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    धन्यवाद कुशवाहा जी बधाई के लिए भी और रचना को विस्तार देने के लिए भी.

chaatak के द्वारा
February 24, 2012

मीनू जी, सादर अभिवादन, पिता के लिए लिखी इन पंक्तियों ने पिता का वह वाट-वृक्ष रूप प्रस्तुत किया है जो, जगत-पिता से भी बढ़कर है, सच है इस धरती पर साक्षात, ब्रह्मा-विष्णु-महेश का रूप है पिता, वो जताता नहीं है लेकिन तनिक भी अंतर्दृष्टि हो तो हर पल उसके अन्दर ये सारी छवियाँ नज़र आती हैं| बहुत ही अच्छी रचना इस मंच पर डाल कर आपने कम से कम मुझे तो उपकृत ही किया है, बहुत बहुत धन्यवाद| अच्छे लेखन पर बधाई! ५/५

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    चातक जी,प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आप ही नही हम सभी उपकृत है अपने माता पिता के द्वारा.

akraktale के द्वारा
February 24, 2012

मीनू जी सादर नमस्कार, पिता के प्रति दिल से निकली सुन्दर अभिव्यक्ति. बधाई. शीश झुका तेरे कदमो में नाप रहा गहराई को, सदा मिला सहारा तुझसे मन की अंगडाई को, सबसे ऊँचे तरुवर की छांह भी दूर तलक ना पहुंचेगी, सात समंदर पार सहारा देता साया तेरा मुझको.

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    धन्यवाद रक्ताले जी आपने पंक्तियां जोङी बहुत अच्छा लगा

jlsingh के द्वारा
February 24, 2012

मीनू जी, नमस्कार! वैसे तो हर पंक्ति अनमोल है और सबके लिए उपयुक्त है फिर भी कुछ पक्तियां जो मुझे ज्यादा पसंद आयी वे हैं — नियंत्रित कर मन के पशु को, मानव बनना भी तो तुमने ही मुझे सिखाया पुजा की राह दिखाई,आत्मतुष्टि की बात बताई कहा-जहाँ कही दिल घबराए,राह नजर ना आए ईश्वर के चरणों में शीश झुकाना पल में बाधाओं से मुक्ति पाना बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति!! वैसे भी हम सभी माता पिता के ऋणी हैं!

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    आप सही है जवाहर जी मेरी ये रचना सभी पिताओं को समर्पित है,आपने पसंद किया आपका आभार

sinsera के द्वारा
February 24, 2012

मीनू जी नमस्कार, माता पिता ने जो दिया उसका बयान कर पाना संभव नहीं है. जीवन भी छोटा पड़ जायेगा. बहुत सुन्दर , मन को छूने वाली रचना…

    minujha के द्वारा
    February 25, 2012

    सच कहा आपने सरिता जी पर थोङा बहुत समेट पाने की  कोशिश की है,आभार रचना को सराहने हेतु.


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