मेरी लेखनी :मेरा परिचय

Just another weblog

23 Posts

971 comments

minujha


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

अब हमारी बारी है

Posted On: 22 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

27 Comments

जुङें,जोङें और जोङते चलें

Posted On: 21 Dec, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

35 Comments

सिखा गई ज़िंदगी

Posted On: 3 Dec, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.75 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

38 Comments

एक पाती आस भरी

Posted On: 12 Jun, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 4.60 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

73 Comments

आओ उसकी जिंदगी सजाएं

Posted On: 18 May, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

74 Comments

ख्वाहिश ही रही

Posted On: 24 Apr, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

62 Comments

ये बंधन तो प्यार का बंधन है….

Posted On: 15 Apr, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

45 Comments

दिल का बाज़ार सजा है

Posted On: 25 Mar, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 4.89 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

52 Comments

क्योंकि वो पुरूष है….

Posted On: 4 Mar, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

112 Comments

ऐ पिता मेरे

Posted On: 23 Feb, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

40 Comments

Page 1 of 3123»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय मीनू जी , सादर नमस्कार ! आपने गणतंत्र दिवस के अवसर पर ये लेख लिखा है ! हम आज़ाद देश के गुलाम नागरिक आपको भी शुभकामनाएं देते हैं ! बिलकुल सही सोच है आपकी हम देश के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को महज एक छुट्टी कि तरह ही लेते हैं. इसके पीछे बड़ा कारण है कि ना तो हमारे नेता चाहते हैं कि कोई ऐसा कार्यक्रम हो जो उनको बहुत लंबे समय तक रोके रखे क्योंकि सभी तो व्यापारी हैं और ना ही हम चाहते हैं कि नेताओं कि बकवास सुने. इस कारण से ही बच्चे भी इसके महत्त्व को नही जान पा रहे हैं. अवश्य ही हमें इस गणतंत्र दिवस से ही इसे कुछ इस तरह मनाने कि कोशिश करना चाहिए कि जों बच्चों को इसके महत्त्व को समझा सके. सुन्दर आलेख. वंदे मातरम.

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

मेरे भाई,मैं आपकी बातों का सम्मान करती हुं,और यकीनन मेरी उम्र अब उतनी छोटी नहीं है,जहां मुझे कोई गलत को सही कहने कह दे तो मैं सहमत हो जाउं,मेरी अंदर एक अपनी सोच भी है और उसे दिशा देने की बौद्धिक क्षमता भी,चलिए आपकी बात मान भी लेते है कि संदीप जी सच देखते और सोचते है,मैं ये भी कहना चाहुंगी कि वो बहुत अच्छा लिखते भी है...हो सकता है उन्हे बहुत लोगों की सोच या विचार पसंद ना आते हों...पर मेरे भाई, विरोध करने का भी एक तरीका होता है ,अपने से बङी उम्र के लोगो के प्रति अभद्र भाषा या उन्हें नीचा दिखाकर यदि आप अपने आप को विचारवान कहते है तो मैं इससे ना सहमत थी ना होना चाहुंगी...ये मंच सबका है...और हरेक को अपने विचारप्रकट करने का अधिकार है उसमें किसी का हस्तक्षेप करना मुनासिब नहीं....आप किसी को विशेष  बनाने के लिए किसी का अनादर तो नहीं कर सकते...ये मेरी अपनी सोच है आप इसे अभिशाप कहें या वरदान...आपका मैं सम्मान करती हुं इसलिए आपसे इतना कुछ कह पाई,संदीप जी के ब्लॉग पर भी गई थी पर यदि वहॉं जवाब में कुछ लिखा तो.. अपनी फजीहत करवाना ही होगा...खैर आपने लायक समझा खुशी हुई...आभार

के द्वारा: minujha minujha

सादर प्रणाम दी! संदीप जी का आलेख पढ़ने के लिए हार्दिक आभार........................यह पहली बार नहीं हुआ कि मैं किसी कि पोस्ट से कुछ ब्लोगरों को अवगत कराया हुआ...........इसके अलावा भी ऐसे कई ब्लोगरों के आलेख कुछ अलग होने पर सबको अवगत कराता आया हुआ.............यक़ीनन आप एक बहुत अच्छी इन्सान है और मेरे लिए सम्मानीय भी.................परन्तु इस पुरे मानव जाति के लिए यह अभिशाप है कि आप जैसे लोगों के चुपी साधने या फिर जो लोग दिखाना चाहते हैं उसे देखने के कारण ही पूरा विश्व नर्क हो गया है........ यह तो मैं जनता हूँ कि आप उनमे से नहीं जो चुपचाप यह सब देखते रहे..........पर यक़ीनन आप उनमे से हैं जो वहीँ देख पाते हैं जिसे कुछ लोग दिखाना चाहते हैं..........दी आप किसी भी घटना या विचार को अपने आखों से देखने कि कोशिश करिए.............वो भी समय और सीमा से मुक्त होकर............विनम्र निवेदन के साथ..............आपका अनुज......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीया मीनू जी, सादर अभिवादन! अब मैं भी अपने गाँव की सच्ची घटना सुनाता हूँ! - मेरे गाँव में पड़ोस में ही एक पति अपनी पत्नी को वैसी ही बेरहमी से पीटता था - वह स्त्री बाद में बैठकर रोती भी थी. एक बार उसका पति बहुत गुस्से में था और लोहे के कलछुल (दाल चलाने वाला बड़ा चम्मच) से अपनी पत्नी को मार बैठा और खून निकल आया- उस दिन बेचारी बहुत देर तक दर्द से कराहती रही. मेरी माँ से बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने(मेरी माँ ने) गाँव के ही डॉ. को बुलाकर उसकी मरहम-पट्टी करवाई सुई-दवाई दिलवाई ... मेरी माँ ने उसके आदमी को उस दिन खूब 'फटकार' लगाई ... वह भी अफ़सोस करने लगा ... "क्या करें चाची, गुस्सा दिला देती है, ... यह चुप नहीं रहती है" ... सिलसिला आगे भी चलता रहा, पर थोड़ी कमी आई. उस औरत ने फिर भी अपने पति की शिकायत किसी से नहीं की ... यही कहती- "मर्द है तो गुस्सा तो करेगा ही!".....कुछ साल पहले उस औरत के पति का देहांत हो गया (ज्यादा शराब वजह रही होगी). उस औरत(रिश्ते में भाभी) ने मुझसे कहा- "बेटा तो है जवाहर बाबु, पर 'अपना आदमी' (पति) नहीं रहने से सब सुख बेकार है!" ... मैंने भी उस भाभी तुल्य स्त्री को मन ही मन प्रणाम किया!...ऐसी होती है भारतीय नारी! ....यह भी सहनशीलता की मिशाल है! मीनू जी, आपके विचारों का मैं पहले भी आदर करता रहा हूँ, आगे भी करता रहूँगा!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: minujha minujha

एक शांत समुद्र में एक नाविक कभी कुशल नहीं बन पाता. आज मैं अपनी हार से पूर्णतः बाहर आ चुंकी हुं और मुझे यह भी यकीन है कल की जीत मेरी ही है,अवश्य ही हर किसी के जीवन में ये वक्त आता है, उस समय यही याद रखना चाहिए कि असफलता यही दर्शाती है कि सफलता का प्रयास पुरे मन से नही किया गया,अगर लक्ष्य को पाना है तो उसमें अपना सर्वस्व झोंक कर उस छटपटाहट को पैदा कीजिए,जिससे आपकी सांसों के तार जुङे हों,यकीन मानिए सफलता सबसे पहले आपको आकर गले लगाएगी….उम्र के इस पङाव पर आकर जिंदगी नें मुझे जो कुछ सिखाया या कहें मैनें जो कुछ जिंदगी से सीखा उसे आपसे बांटकर असीम संतोष का अनुभव कर रही हुं आप इतने दिनों के बाद मंच पर हैं , देखकर अच्छा लगा ! आपने अपनी हिम्मत और अपने उच्च विचारों के बल पर अपनी परेशानियों पर विजय पाई है ! ये न केवल प्रेरणादायक है बल्कि हमें सिखाता भी है ! बहुत सुन्दर

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

अलीन जी नमस्कार सबसे पहले आपके विचारों के लिए हार्दिक धन्यवाद अब क्रमवार आपकी जिज्ञासाओं का उत्तर देना चाहुंगी 1.श्रम की श्रेणी होती है ,जिसके आधार पर उसके पारिश्रमिक का आकलन किया जाता है,ये नही किया जाय तो शायद एक ही संस्थान के उच्चाधिकारी-अर्दली का वेतन समान हो..... 2.त्याग का मूल्य वहां नही होता जहां एक  पक्ष  वैराग्य की ओर अग्रसर हो जदां परस्पर स्वार्थ की भावना ना हो, जहां घर-गृहस्थी की बात हो,जीवन के प्रति मोह बरकरार हो.वहां त्याग का मूल्य खुद बखुद लग जाता है 3.कर्तव्य है, पर कर्तव्य का मतलब ये कभी नही होता कि हम अपने अधिकार भूल जाएं,और नारी कभी मजबूर नही होती,अगर  दिखती है तो उसे उसका खोया आत्मविश्वास कहते है मजबूरी नही.......और गृहिणी तो कभी मजबूर हो भी नही सकती उसके पीछे उसका पूरा परिवार होता है 4.ये सारे शब्द बस  मेरे आक्रोश के पर्याय है और कुछ नही......,मेरी  पहचान तो यथावत  है बस  उसका एहसास  सबको हो जाए यही इच्छा है 5.आपने सुना तो होगा कि इंसान  प्रेम  और प्रशंसा  का भूखा होता है,गृहिणी भी एक  इंसान है कोई  महान  आसमां से उतरा फरिश्ता नहीं और गुलाम  शब्द का तो मेरे आलेख में  जिक्र  तक नही .....कहां से जोङ  दिया आपने......... मैं निश्चिंत  हुं ,अलीन जी मैं एक  गृहिणी हुं जो बस सम्मान की लङाई लङ  रही है ,उसे हासिल करके भी  मैं एक  गृहिणी  ही रहुंगी आपका  आभार

के द्वारा: minujha minujha

आदरणीय चाचा जी कल से ही आपको और अलीन जी को लिखने के लिए तत्पर थी,पर नेट साथ देने को तैयार ही ना था पहली बात - आपकी हर बात  मेरी समझ  में आ   गई ,पर  मैं कहा कह रही हुं कि मैं उन पात्रों की तरह बनना चाहती हुं मैं तो बस यही कह रही हुं कि मैं संतुष्ट हुं अपने आप से,पर मेरे अपने नहीं.....,यही कारण  है कि वो मुझे वह सम्मान नही दे पा रहे जिसकी मैं  हकदार हुं.,और अगर देना  चाहते भी है तो वो दिखता नही........बस वैसे आपको बता दूं आपकी बातो को जब मैने आपके दामाद जी से बताया तभी से वो आपकी विद्वता के गुण  गाने लगे है....,जो मुझे भी अच्छा  लगा वैसे एक  बात जरूर बता दीजिएगा-.......चाचीजी के नाम से डर गए ना.........

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी, एक आम भारतीय गृहिणी के आहत आत्मसम्मान की बड़ी भावपूर्ण व्याख्या की है आपने । यह सत्य है कि नौकरीपेशा महिला के आत्मविश्वास से भरे परिदृश्य वाले आज के सामाजिक परिवेश में घर परिवार सम्भालने वाली गैर-नौकरीशुदा नारी का अपना अस्तित्व कहीं विलीन सा हो गया लगता है, चाहे वह कितनी भी शिक्षित सुसंस्कृत क्यों न हो । उसके त्याग और बलिदान को हमारा समाज एक आमतौर पर सुलभ अधिकार मानने का अभ्यस्त रहा है, जो स्थिति नारी को पुराने समय में तो नहीं कचोटती थी, परन्तु आज की स्थिति में वह स्वयं को भागती भीड़ के बीच कहीं उपेक्षित सी अवश्य महसूस करती है । आपने आम गृहिणी की आन्तरिक पीड़ा को जो अभिव्यक्ति दी है, वह आपकी कुशल शिल्प से युक्त लेखनी के माध्यम से ही सम्भव था । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

स्नेही मीनू जी, शुभाशीष लगता है चची का रंग भतीजी पे आ गया है. ऊपर की पंक्तियों में सब कुछ लिखा है. १. अंतर्द्वंद , महाभारत में रन क्षेत्र में अर्जुन की यही स्थिति थी. व्याख्या स्वयं करिए. न समझे तो फिर बताऊंगा. २. किसको क्या मिला ये मुकद्दर की बात है त्याग व् बलिदान. धरती माँ की तरह . ३. एक चाँद आसमान पे है एक मेरे साथ है आपका बहुत बड़ा सौभाग्य है कि आपके पतिदेव मेरे परम आदरणीय दामाद को आप से यह कहने का सु अवसर प्राप्त होता रहता है. अगर दोनों ही व्यस्त हो जाते तो ये सुनने का अवसर न मिलता. ४. दिल मांगे मोर आपकी व्यथा स्वभाविक है पर आपका दिल और चाहत रखता है. ऐसा ही समाज हो गया है. जरा अपने दिल पे हाथ रख कर सोचिये जिन पात्रों की तरह जीने की लालसा आप में उत्पन्न हो रही है क्या वो जीवन बढ़िया है या आपका अपने परिवार के साथ का पूर्ण समर्पित जीवन. बताइए मैं कहाँ भगा था जो आप चाची से शिकायत करने वाली थीं. एक कहावत है कि थोडा लिखा ज्यादा समझना. दूसरी नहीं बताऊंगा. मेरे दामाद जी को ise पढ़ा इयेगा और हमें बताइयेगा

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

मीनू जी, मेरी पत्नी शादी से पहले कार्यरत थीं परन्तु मुझे लगा कि कार्यरत महिला के लिये घर और दफ़्तर दोनों को निभाने में दुगने श्रम की आवयकता होती... जैसा की मैने अपने अनुभव से सीखा. पैसा भले ही कुछ अधिक आ जाता है परन्तु परिवार इस का खामिआजा भुगतता है... आरम्भ में मेरी पत्नी को लगा कि शायद वो नौकरी न छोडती तो ठीक था परन्तु कालान्तर में वह मेरी राय से सहमत है कि आज उन्हें वाहर की भाग दौड नहीं करनी पडती और बच्चों को भी वह ठीक से देख पाई साथ ही परिवार को भी. नौकरी पेशा (जिनमे पति या पत्नी शामिल हैं) समझना चाहिये कि आफ़िस ८ -१० घंटे का होता है जबकि घर का काम २४ घंटे का है और इस बात का एहतराम करना चाहिये. आर्थिक रूप से घर को सबल करना पति का काम है और साथ ही पत्नी की सभी सुख सुविधाओं के लिये भी वही जिम्मेदार है. पत्नी "होम मेकर" है ना कि "काम वाली बाई".. ये बात पत्नी और पति दोनों को एक दम साफ़ और सपष्ट रहनी चाहिये. मन के भावो को पाति के रूप में सबसे साझा करने के लिये आभार.....लिखती रहिये

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

एक गृहणी को गुमनाम पत्र...............! १. श्रम भी और श्रेणी भी बात कुछ अजीब नहीं लगती.............यह सच है कि श्रम कई प्रकार के होते हैं पर किसी व्यक्ति के श्रम कि कोई श्रेणी नहीं हो सकती .......! २. त्याग और वो भी किसी मूल्य के लिए फिर तो यह त्याग ही नहीं रह जायेगा कोई और शब्द उपयोग करिए.........! ३. मैं नहीं समझता कि आपने अपना पहचान खो दिया बल्कि एक ऐसी पाचन को अपनाया है जिसे आप या तो कर्तव्य समझती हैं या फिर मज़बूरी.........यदि कर्तव्य है तो शिकायत क्यों.........और यदि मज़बूरी है तो फिर इसी तरह मजबूर बने रहिये ............एक मजबूर को शिकायत करने का भी हक़ नहीं.......! ४. आप तो पहले निश्चित हो जाए कि आप श्रम कर रही हो, त्याग कर रही हो या फिर सेवा कर रही हो या फिर गुलामी........! आप अपनी पहचान को लेकर संशय में हो................ ५. प्रशंसा किसके लिए श्रम, त्याग, सेवा या फिर गुलामी के लिए............यदि श्रम, त्याग और सेवा की बात की जाय तो इन्हें प्रशंसा की आवश्यकता ही नहीं या यूँ कहें कि ऐसा कहना एक बेईमानी सी होगी................और यदि गुलामी के लिए तो गुलामों की प्रशंसा की नहीं जाती.........! तो पाहिले आप निश्चित हो जाओ कि आप हो क्या और क्या होना चाहती हो .............. आपका, एक शुभचिंतक

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय मीनू जी.....सादर नमस्कार..... आपकी सभी बातों से सहमती......लेकिन.....इतना भावुक होने की क्या आवश्यकता है.....ये तो घर-घर की कहानी है....''तुम करती क्या हो सारा दिन.....???'' माना....कुछ अपवाद होते हैं....लेकिन स्थिति इतनी बदतर तो नहीं हो सकती कि एक गृहणी....को अपने ही घर में....अपनों के द्वारा तिरस्कृत किया जाये....जरूरत है....अपनी मानसिकता को साकारात्मक बनाने की.....फिर देखिये.....जिंदगी कितनी आसान हो जाती है..../// अब देखिये ना.....अगर गोलगप्पे खाने का मन करे तो एक गृहणी ही अपना ये शौक आसानी से पूरा कर सकती है.....लेकिन काम-क़ाज़ी महिला को इस काम में भी सोचना पड़ता है.....कैसे...?....क्यों....?...किसलिए....?.....इसका फायदा-नुक्सान....?? अगर गला खराब हुआ तो ऑफिस से छुट्टी.....मिलेगी या नहीं....चलो नहीं खाते....?? ये तो छोटा सा नमूना है.....और भी बहुत फायदे हैं.....सोचिये....फिर देखिये......अजी आप तो गृह-लक्ष्मी हैं.....आप घर से नहीं----घर आपसे है....//// आपका मुकाबला कौन करेगा......///// so....relax and enjoy yourself.....thanks....

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

मीनू जी सादर नमस्कार, यह पहली बार नहीं है, गृहणी का दर्द कई बार इलाज के लिए पुकार चुका है किन्तु आज तक कोई सही दवा नहीं मिली है. अब बच्चों का भी रुख ऐसा होगा किसे पता था और सासू माँ तो हमेशा घर में रहने वाली बहु को ही ज्यादा लाड करती थी क्योंकि वह उसके साथ दिन भर दुःख सुख को बाँट भी तो पाती थी अब वह भी कामकाजी बहु को दुलारने लगे तो फिर दिल पर पर्त्थर तो रखना ही होगा. बहुत जरूरी है इस श्रम को पुरस्कार देना, कई बार खान ठीक से ना बना हो या समय से ना बना हो तो बातें भी सुनने को मिलती हैं किन्तु जब कोई खाने पर आये और उंगलियाँ चाटते रह जाए तो तारीफ में श्रम का भुगतान भी करता है. कभी समय पर नाश्ता न मिलने से नाराज पति महोदय प्रतिदिन पत्नी की तैयारियों के कारण ही समय पर पूरी तरह तैयार हो कर पत्नी के कारण ही तो जाते हैं कभी उनका मन तारीफ़ करने को करता तो होगा. और फिर समकक्ष क्या आपने यह जुमला तो सूना ही होगा घर का जोगी जोगना और आन गाँव का सिद्ध. अब इसको कैसे झुठलाया जाए. सुन्दर और मार्मिक आलेख. कोशिश जारी रही तो एक दिन गृहणी के घरेलु श्रम का भी बड़ा नाम होगा. शुभकामनाएँ.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: minujha minujha

आदरणीय मीनू जी, सादर अभिवादन! आपने बड़ी खूबसूरती से एक गृहणी के दर्द को उकेरा है, यह विश्लेषण लगभग सभी गृहणी पर लागू होता है ..... पर मैं अपनी पत्नी के साथ उन सभी गृहणियों की इज्जत और आदर की नजर से देखता हूँ जिन्होंने अपने त्याग से परिवार और अपने बच्चों में वह संस्कार पैदा करने में सक्षम साबित हुई हैं, जो कामकाजी महिला नहीं कर पाती समयाभाव के चलते. कुछ चीजें नजर नहीं आती महसूस की जाती हैं. मेरी माँ ने, मेरी बहनों ने, मेरे बड़े भ्राता ने, परिचितों ने मेरी पत्नी के क्रिया कलापों को हमेशा सराहा है ..... फिर भी मैं यह दावे के साथ नहीं कह सकता कि जो दर्द आपने बयान किये हैं, वह मेरी पत्नी महसूस नहीं करती होगी.... तब का माहौल कुछ और था ज्यादा लोग अपनी पत्नी को गृहणी ही बनाये रखना चाहते थे. आज जिन्दगी बहुत तेज गति से दौड़ रही है ..... सबको अपनी अपनी पड़ी है. आपका दर्द वजिब है .... सांत्वना के लिए कहूँगा ... यह पृथ्वी हम सबकी माँ हैं ..... आज यह कितना दर्द सह रही हैं ... किसी ने पृथ्वी माँ के दर्द को महसूस किया है ? अगर महसूस किया भी है तो दर्द को कम करने के क्या उपाय किये हैं? ..... आपकी भावना के साथ पूरी हमदर्दी के साथ - जवाहर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

मीनूजी आपके विचार बहुत अच्छे लगे |आप अपना काम करती जायें लोगों का काम है कहना वो अपने अन्दर जो है उसे जाहिर ज़रूर करतें है बिना यह सोचे कि इस बात का समाज पर क्या असर होगा |अभ्रद भाषा प्रयोग करने वालों के लिए जागरण जगशन को कड़े कदम उठाने चाहिए |बैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं भाषा पर हमारा नियंत्रण ज़रूर होना चाहिए | मेरे विचार में यह मंच विचारों को लोगों के एक बड़े हिस्से तक पहुंचाने का माध्यम है ना कि आपसी खुन्नस निकालने का अखाड़ा |सभी पाठको और बुध्द्जीवियो से निवेदन है किसी को जलील करने से पहले सौ वार ज़रूर सोचे |यदि आप किसी का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम अपमान तो ना कीजिए |एक लेखक समाज को बहुत हद तक सच्चाई का परिचय देता है |मर्यादा नाम की एक चीज़ होती थी कही ऐसा अकाल ना पड़े कि लोग तमीज को ढूढ़ते रह जाए |

के द्वारा: punitasingh punitasingh

सरिता जी नमस्कार विगत  कुछ  दिनों से समय  कम  मिल पाने  के  कारण  जब  मैं  लॉग -इन  करती  हुं  तो ज्यादातर  जो रचनाएं फीचर्ड होती है उन्ही को पढकर अपने विचार प्रकट कर पाती हुं,या फिर नीचे पाठकों की जो प्रतिक्रियाएं होती है उनपर जाकर,अब अलीन जी ने कब ये रचना पोस्ट की और इसके अंदर क्या था इससे मैं अनभिज्ञ  हुं,वैसे  भी सच कहुं तो उनकी ज्यादातर रचनाएं मेरे सर के ऊपर से निकल  जाती हैं और अक्सर मैं अपनी बुद्धिमत्ता को कोस उठती हुं,वैसे ये भी कहुंगी कि अगर उन्होने कोई गलती की हो तो उन्हे अवश्य स्वीकार कर उसमें सुधार करना चाहिए,चलिए  आप भी अब गुस्सा थुकिए और उन्हे अनुज  समझ  माफ  कर दीजिए बेचारे कुशवाहा जी के पास माफी की गुहार  लगा रहे थे.....और भला कमेंट  डिलीट की बात  हम सोच भी कैसे सकते है वो भी आपकी.

के द्वारा: minujha minujha

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

दीदी, अभी आपने माना न कि मुझे समझाना बहुत मुश्किल है......इस संसार ऐसी बहुत सी चीजे हैं जिसको समझाने का मतलब है अपना वक्त जाया करना......मैं कोई भी काम आगे बदहने के लिए नहीं करता हूँ..बल्कि उस असते को रोकने के लिए जो सत्य का चोला पहने खड़ा है.....और मेरा अपना अन्दांज है बैटन का रखना....आपकी और यमुना जी की शैली सचमुच ज्ञानवर्धक होती है और निश्चय ही मेरे जैसे लोगों और बच्छों के लिए उपयोगी है...........परन्तु जहाँ घमंड और गलतफहमी से चूर-चूर लोगों की विचार धारा अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करके ऐसी सम्मान और मर्यादा की बात करती हो जो हवा के एक झोके से तहस-नहस हो जाती है तो वहां सिर्फ मेरी ही शैली की जरुरत है.आज के दुनिया में जो सम्मान और मर्यादा दिख रहा है, उसे ख़त्म करना अति ही आवश्यक है औरउसके लिए कुछ हटकर शैली अपनानी ही पड़ेगी......आप अभी दुनिया के असिलियत को घर के अन्दर बैठकर देख रही हैं जब खुद उसका सामना करेंगी तो पता चलेगा कि स्थिति कितनी भयावह है. .......आज से ४ साल से पहिले मैं भी आप ही की तरह विचार रखता था....पर अब जो हकीकत का सामना किया हूँ तो पता चला है कि सोच और सच्चाई में कितना अंतर होता है.... पर ऐसा नहीं की आपकी शैली की जरूरत नहीं.....बहुत ही आवश्यक है पर वो सिर्फ मेरे जैसे इंसानों के लिए.......!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मीनू जी, संवेदनशील सामाजिक विषमताओं पर आपके मंथन की शृंखला की यह कड़ी भी एक ज्वलन्त प्रश्न के साथ-साथ समाधान का रास्ता भी दिखाती प्रतीत होती है । सरकारी स्तर से इस मामले में किसी सहायता की अपेक्षा रखने का कोई तुक नहीं बनता । उसने कानूनन रास्ता निकाल दिया, यही बहुत है । अन्तर्जातीय विवाह हो या विधवा विवाह, समाधान का सारा दारोमदार समाज का ही होता है । हमारी कुरीतियाँ बेड़ी बनकर हर जगह हमारे पाँव जकड़ लेती हैं, जिनसे छुटकारा पाना आसान नहीं है । विधवाओं की स्थिति सचमुच बड़ी भयावह होती है । सबसे पहला कदम पूरे साहस के साथ यदि विधवा से जुड़े दोनों परिवार उठाने का संकल्प ले लें, तो थोड़ी नानुकुर और थुक्का फ़ज़ीहत के साथ समाज को अन्तत: उनका निर्णय स्वीकार करना पड़ता है । परन्तु अक्सर इस मसले पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे, ऐसी स्थिति में ये परिवार मूक-बधिर बनकर अपने ही एक अंग को अभिशप्त जीवन जीने की राह पर धकेल देते हैं, यह एक कड़वा घूँट है । साभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

बस समाज की दयादृष्टि के साथ साथ मानसिक और भावनात्मक संबल चाहिए उसे………………….कुदरत प्रदत्त उस खाई से भी गहरे जख्म को तो कोई नही भर सकता पर उसके ऊपर समाज के सहारे व संवेदना की मूंज जरूर बांधी जा सकती है,जिसपर चलने में उसके पांव तो जरूर डगमगाएंगे पर पार उतरते उतरते वो अपना खोया आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पुन: प्राप्त कर लेगी…….जिंदगी के रूपहले रंग भले फिर उसके दामन में ना छिटके,पर अपनी मेहनत और लगन के रंगों से हासिल स्वाबलंब से वो जरूर अपनी जिंदगी सजा लेगी,….बस हमे माध्यम बनकर उसे उसकी क्षमता का एहसास दिलाना होगा ,जीने के एक सही राह दिखानी होगी…ताकि एक जीवन यूंहि अंधेरी कोठरी में घुटते-सिसकते ,अपने आप को कोसते अपने अनंत सपनों को समेटते जाया ना हो जाए………….,क्या आपका दिल नही चाहेगा—-“आओ उसकी जिंदगी सजाएं.”…. प्रिय मीनू जी , सस्नेह सर्व प्रथम आपको बधाई इस बात की आपने बहुत अच्छा विषय चुना ही नहीं प्रस्तुत भी बहुत अच्छा किया है. मेरे विचार आपसे शत प्रतिशत मिलते हैं . ek वर्ष ki संतान होने पर ममेरी बहन के सम्मुख पुनर विवाह का प्रस्ताव रखा था हलन की उसने स्वीकार नहीं किया उसका एकलोता पुत्र आज इंजिनीअर है. अपनी मान को भी श्वेत वस्त्र dharan करने नहीं दिया. जिन परम्पराओं में विधवा pravesh वर्जित है सारे कार्यक्रम मान के हाथों संपन्न कराये. हरेक को जीने का adhikar है. यदि सही व्यवस्था प्राप्त हो जाये तो पुनर विवाह अनुचित नहीं पर saavdhani के साथ. समाज और विकृत होता ja रहा है.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

जिसे समाज ने विधवा का नाम दिया है,जिस इंसान ने उसकी जिंदगी में जाने कितने रंग भरे,उसी की चिताग्नि में उस स्त्री की सारी खुशियां,सपने और रंगों को स्वाहा कर दिया जाता है,रह जाती है तो बस सफेदी में लिपटी,एक अभागी,लाचार सांस लेती एक नारी देह…,एक तरफ तो अपनी वैवाहिक खुशियों को खोकर यूंहि वो स्तब्ध होती है और उसी परिस्थिति में समाज उसपर वर्जनाओं की एक लंबी श्रृंखला थोप कर हर पल ये एहसास दिलाना चाहता है कि वो अधूरी हो चुंकी है और इस अधूरेपन में उसकी साथी सुखद यादें नही प्रतिपल दुखी करने वाले कायदों की फेहरिश्त होगी,जो उसके घावों को भरने तो नही ही देगी हां नासूर जरूर बना देगी………..पूजा-पाठ,धार्मिक कर्मकांड करने और समाज से यथासंभव दुरी बनाए रखने की ताकीद के साथ,वस्त्रों,आचार-विचार ही नही खाने-पीने तक में सादगी का पालन करने का आदेश……..,”कहां है समाज की संवेदनाएं” मारा कर्तव्य है कि अपनी बिरादरी,समाज,आसपास,परिवार जहां भी हमें ऐसी अबलाएं दिखें हम उनके मन से ना केवल परिवार पर बोझ बन जाने के पूर्वाग्रह को निकालें बल्कि उम्र और काबिलियत के हिसाब से उन्हे जीवन को चलायमान बनाए रखने की दिशा दिखाएं ताकि अन्य ओर ध्यान लगा कर उसकी जिंदगी के बांकी दिन भी संवरे और अपनी अपूरणीय क्षति को भूलने का बहाना भी वो पा सके-ये हमारा नैतिक कर्तव्य भी है और मानवता का एक प्रमुख धर्म भी……बस समाज की दयादृष्टि के साथ साथ मानसिक और भावनात्मक संबल चाहिए उसे………

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी सादर प्रणाम आपने बड़ी संवेदनशील बात कही है. आपका समर्थन करता हूँ. मीनू जी आजकल रिश्तों की मिठास सामाजिक-आर्थिक स्टेटस के पैरों तले रौंदी जा रही है. मैंने इस बात को महसूस किया है. एक जमाना था जब इन्सान अपने मामा, चाचा, बुआ इत्यादि को रिश्तों से याद रखता था मगर आज सिर्फ आर्थिक स्थिति से याद रखता है. आज हर चीज व्यवसायिक हो चुकी है. सुनने में थोडा बुरा जरूर लगता है लेकिन ये आज की एक कडवी सच्चाई है. किसी भी रिश्तेदार से मिलते समय मनुष्य सोचता है की - ये मेरे किसी काम आएगा की नहीं? इससे रिश्ते निभाने से मेरा क्या फायदा होगा? कहीं इससे रिश्ता रखने से मेरे सामाजिक मान-सम्मान में कोई कमी तो नहीं आएगी? कोई पूछ देगा की ये तुम्हारा कौन है, तो मैं क्या कहूँगा? इत्यादि. यही आजकल की दुनिया है और ऐसे ही रिश्ते रह गए हैं. भावावेश में कुछ ज्यादा लिख दिया हो तो क्षमा चाहता हूँ. छोटा भाई समझ के माफ़ कर दीजियेगा.

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

आदरणीय मीनू जी ...... सादर प्रणाम ! आपने खिलौनों पर ही आधारित अपना यह लेख लिखा है तो मेरे मन में एक ग्रामीण खिलौने का ध्यान आ रहा है जोकि मेले में और किसी जी.टी. रोड पर लगी हुई खुली दूकान से भी मिल जाता है ..... लकड़ी के ट्रैक्टर या फिर कोई भी और लकड़ी का खिलौना ..... आपने मुंशी प्रेमचंद जी कि नायाब रचना “हामिद का चिमटा” तो पढ़ी ही होगी बस कुछ ऐसे ही खिलोने चाहिए बच्चों को ...... हार्दिक आभार सहित :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

विक्रम जी,नमस्कार इतने दिनों बाद अपनी इस रचना पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर खुशी हुई,विक्रम जी मैनें भी उस यात्रा के दौरान ये बात महसूस किया था कि इनका प्रदर्शन सर्वथा अनुचित है और सच मानिए अगर सरकार चाहे तो कोई इनकी दुनियां में खलल नही डाल सकता,पर मुझे कुल मिलाकर यही प्रतीत हुआ कि ऊपर से लेकर नीचे तक सभी का इसमें फायदा है इसलिए इसपर सभी चुप्पी साधे बैठे है,तो यहां तो इंसानों का ही तमाशा बना दिया गया है इससे बङी अव्यवस्था क्या होगी,इस आलेख का ध्येय यही है कि जब आप उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं ले सकते तो कम से कम उस पिंजङे से आजाद तो कर दें,शायद वो बाहर निकल कर जीना सीख जाए,क्योंकि उनकी स्थिति,एक तरफ कुआं एक तरफ खाई वाली है,आगे जो उनका नसीब, एक बार फिर आपका शुक्रिया ,धन्यवाद

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी, सादर, देरी से प्रतिक्रिया के लिए माफ़ी चाहता हूँ, घूमते-घामते आपकी इस पोस्ट पर आ गया, आपने जारवा जनजाति का वृतांत से उल्लेख किया है, आपकी बातों से मैं बिल्कुल सहमत हूँ, लेकिन क्या आधुनिक इंसान जीने देगा इनको, आपको तो पता ही होगा, जारवा लोगों का एक अर्धनग्न नाच का वीडियो 'यूटयूब' पर डाला था किसी ने, बाद में पता लगने पर उसको हटा दिया गया, लेकिन ये नाकाफी नहीं था, क्या ये कोशिश नहीं करनी चाहिए थी, कि ऐसा क्यों हुआ? जहाँ उनको, कोई भी वस्तु देने, उनके साथ बात करने, मिलने तक की मनाही हो, वहां ऐसा कैसे हुआ? क्या इससे सुरक्षा व्यवस्था की चूक जाहिर नहीं होती, या फिर ये भी तो इंडिया का ही भाग है, और दिल्ली से लेकर पूरे देश में जो अव्यवस्था का आलम है, क्या उसी का नतीजा नहीं है ये? आपकी राय का इंतज़ार रहेगा........धन्यवाद.

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

मिनुजी आपने बहुत ही अच्छा चित्रण किया है पुरुष नारी संबंधों के विषय में क्यूंकि न तो कोई पुरुष पूर्णतया दोषी होता है और न औरत बस यह विचारो का मतभेद होता है और निस्संदेह विवाह एक निर्वाह करने का ही नाम है और पुरुष स्त्री दोनों का सामान रूप से कर्तव्य एवं अधिकारों का पालन ही समरसता एवं रिश्तों में सामजस्य लाने का काम करता है विवाह एक समझौता है जो इसे समझौते की तरह समझता है वहा विवाद जन्म नहीं लेता और किसी परिस्थिति बस अगर संबंधो में खटास या संदेह वाली बात आ जाये तो दोनों पक्छों को मिल बैठ कर विचार करना जरुरी होता ज्यादतर सम्बन्ध शक के बिना पर आज टूट रहे हैं और शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था जो एक बहुत बड़े हकीम हुए थे यह कहावत शायद आपने भी सुनी होगी अंततः एक बढ़िया लेख आपने लिखा है आशा है महिलाएं एवं पुरुष इससे प्रेरणा ग्रहण करेंगे धन्यवाद .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

जीवन ज्योति जी नमस्कार सबसे पहले ब्लॉग पर आपका अभिनंदन आपकी आलोचनात्मक प्रतिक्रिया का मैं स्वागत करती हुं पर क्षमा याचना के साथ कहना चाहुंगी कि शायद आप आलेख के मर्म को समझ पाने में असमर्थ रहे है या मुझसे ही अपनी बात को रखने में कहीं चूक हो गई है,क्योंकि नस्लभेद पर टिप्पणी करना तो दूर मेरे जेहन में दूर दूर तक ऐसी कोई भावना कभी रही ही नही है अगर आलेख से आपको कुछ ऐसा लगा हो तो क्षमा करेंगे,पर अपनी इस बात पर अभी भी अडिग हुं कि बेचारा स्त्री-पुरूष में कोई भी,कभी भी हो सकता है,गल्ती दोनों में से किसी से भी हो सकती है,बस उसका आकलन निष्पक्ष होना चाहिए.........,जहां तक रामायण और गीता की बात है तो जीवन जी,मैं अपने आप को उस लायक  भी नहीं समझती कि उन महान कृतियों के एक छंद का भी पार पा सकुं,बस छोटे मोटे प्रयास करने की कोशिश करती हुं,जिस पर आप सबकी सराहना और स्नेह पा सकुं,आपके आगमन और प्रतिक्रिया दोनों के लिए आपका बहुत धन्यवाद

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी सबसे पहले बेस्ट ब्लॉगर के लिए आपको बधायी. आपका यह बैचारिक लेख उन पुरुषों के लिए तो जैसे रामायण और गीता की तरह लगेगा जो पुरुष स्त्रियों के सताए हुए हैं. लेकिन मेरी माने तो मुझे लगता है आपने हम पुरुषों पर नश्ल्भेद की टिपण्णी कर डाला है. हम पुरुष लोग कभी बेचारा नहीं थे और न हैं. पुरुष तो सिर्फ अपने स्त्रियों की इच्छा की पूर्ति के लिए बना है, उनकी ख़ुशी में अपना ख़ुशी देखते हैं. अब स्त्री बेवफा हो जाये और तरह-तरह का लांछन लगा कर पुरुषों को तंग करे तो इसमें पुरुष क्या करे. इतिहास गवाह है कि वही पुरुष ताजमहल बनाया तो सिर्फ अपने स्त्री के लिए, पहाड़ तोड़ कर रास्ता बनाया तो सिर्फ अपने स्त्री के लिए. फिर भी यदि स्त्री पराये मर्द के साथ भाग जाये तो इसमें मर्द बेचारा कैसे हो सकता है. बेचारी तो वह स्त्री है जो इतने चाहने वाले, प्रेम करने वाले पुरुष को छोड़ कर मौका परस्त हो तमाम झंझावातों में फंस जाती है......... मीनू जी यदि main आपके विचारों को ठेस पहुंचाया हो तो मुझे मांफ करेंगे ...... सहृदय आभार.

के द्वारा: Jeevan Jyoti Jeevan Jyoti

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी नमस्कार, बधाई, होली मुबारक.... महिला दिवस पर महिलाओं की हैट्रिक की भी बधाई... सज्जन पुरुषों की स्त्रियों द्वारा की जाने वाली दुर्दशा का आप ने अच्छा वर्णन किया है, अभी कुछ दिनों पहले "इंडिया टुडे "में भी ऐसा ही आर्टिकिल छपा था.ये बिलकुल सच बात है की कुछ स्त्रियाँ , पुरुषों की सिधाई का नाजायज़ फायदा उठती हैं.कुछ हफ़्तों पहले श्रीमान सत्यशील अग्रवाल जी "नारी ही नारी की दुश्मन "लिख कर ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बने, जिसमें उन्हों ने लिखा की शाइनी आहूजा की पत्नी ने नौकरानी की पीड़ा को न समझते हुए उसके खिलाफ गवाही दी. मैं ने उन से पूछा की जब बलात्कार जैसे गंभीर आरोप पर एक पत्नी अपने पति का साथ दे रही है तो अवश्य ये नौकरानी की चाल है,यहाँ स्त्री (नौकरानी )शोषित नही बल्कि स्वार्थी है.. मेरे कमेन्ट का उन्हों ने आज तक उत्तर नही दिया .. आप ने आज स्त्री के अनुचित व्यवहार के लिए आवाज़ उठा कर बहुत निर्भीक पहल की है..साधुवाद..

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी इसमें कोई दो राय नहीं की एक अच्छी सोच का प्रदर्शन कर आपने पुरुष समाज की वह वाही तो लूटी ही है साथ में एक छुपे हुए सच को भी दर्शाया है. मीनू जी आपने जो कहा - निन्यानवे फीसदी स्त्रियों की ही भांति संवेदनशील होते है,वे भी नैतिकता ,चरित्र,इज्जत,प्रेम और संबंध निर्वाहन में कुशल होते है,हां एक प्रतिशत अपवाद है...लेकिन मैं इस वक्तव्य में आपसे सहमती नहीं रखती. अगर ऐसा होता तो पुरुष प्रधान समाज का दर्जा ऐसे ही नहीं मिल गया इस पुरुष को हमारे समाज में. मानती हूँ आज स्त्रियाँ अपने स्वार्थ के लिए साम,दाम, दंड,भेद वाली नीति अपनाती है....लेकिन किस से सीखी हैं?...इन्ही पुरुषों से और सब से बड़ी बात ऐसी नीतियां अधिकतर पढ़ी-लिखी शहरी स्त्रियाँ अपनाती हैं....गाँवों में जा कर देखिये....कैसे गुज़र बसर करती हैं....मारें खाती हैं....और बच्चों की खातिर शराबी पतियों के साथ निर्वाह करती हैं. आज शहरों में स्त्री के रहन-सहन के मायने बदल रहे हैं. कुछ हद तक आपके साथ सहमत हो कर भी असहमत हूँ...क्यूंकि अंततः हमारा देश ग्रामीण प्रधान देश है जहाँ नारियों की शिक्षा निम्न है जिसके साथ साथ सोच भी पुराणी है.

के द्वारा: anamika7577 anamika7577

के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

आदरणीय मीनु जी, सादर अभिवादन! आप एक महान नारी जिसने पुरुषों के प्रति सहानुभूति की नजरिया रखती हैं. वरना यहाँ तो.... आपने समझने की कोशिश की है की पुरुष भी प्रतारित हो सकते हैं पर शायद उनके लिए कोई सक्षम न तो क़ानून है न ही सामाजिक सहानुभूति. कोई महिला या पत्नी पुरुष पर इल्जाम लगाये तो तुरंत लोग बिश्वास कर लेंगे और पर अगर पुरुष चिल्लाएगा तो कहेंगे - देखो नाटक कर रहा है. पत्नी पति के प्रति वफादार हो तो उसे पतिव्रता आदि महान संबोधनों से विभूषित किया जायेगा वही अगर पुरुष पत्नीधर्म का पालन करे तो उसे जोडू का गुलाम कहा जायेगा. अगर कुछ ज्यादा लिख गया हूँ तो विद्वतजन माफ़ करें, यह सोचकर की होली में बहक गया हूँ! आप सबको होली मुबारक!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

मीनू जी नमस्कार आपकी ये रचना समझ की दिन प्रतिदिन बदलिटी दशा की तरफ इशारा कर रही है....आपका कहना कि "एक बार जब उसकी सोच विकसित हो गई फिर उसे बदल पाना लगभग नामुमकिन ही है,और उस सोच को दिशा देना हमारे ही हाथ में है,क्योकि वृक्ष की वृद्धि,उसकी फलदायकता ,सबकुछ बीज के सही पोषण पर निर्भर है,हमारे पास अनुभव है,ज्ञान है,सोचने समझने,सही गलत परखने की क्षमता है,क्या इतने सारे गुणों को हम जाया कर प्रतिक्षा करेंगे अपनी संतान के गुणों अवगुणों के विकास को प्रकृति और भविष्य पर छोङकर.हम अपने समाज ,अपनी धरती के लिए कुछ कर सकते है तो बस यही कि उसे एक अच्छा इंसान दे" बिलकुल सही है...बच्चों मे अच्छे संकार तो होने ही चाहिए लेकिन अच्छे संकार अब दादा दादी नाना नानी कि जगह टीवी, रेडियो, मोबाइल व आँय एलेक्ट्रोनिक इन्स्ट्रुमेंट विज्ञापन के माध्यम से दे रहे हैं....ईश्वर हमारे संस्कारों कि रक्षा करे...साधुवाद !!

के द्वारा: डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज" डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी नमस्कार, हमारी प्राचीन परम्पराएं और संस्कार समाप्त हो रहे हैं , उस के लिए नयी पीढ़ी के साथ साथ पुरानी पीढ़ी भी ज़िम्मेदार मानी जाएगी. सेलुलर फॅमिली के चलन के कारन माताएं आज कल बच्चों को बुजुर्गों के बजाय टी वी के पास बैठा के अपना काम निपटाती हैं. सब को समय के साथ दौड़ना है तो बच्चो को अच्छी शिक्षा देने का टाइम कहाँ?लेकिन जिन के लिए यह भाग दौड़ है उन्ही की उपेक्षा हो जाती है.अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है . टाइम मनेजमेंट करना पड़े गा और जो हमने अपने माता पिता से सीखा है वो संस्कार तो बच्चों को देने ही पड़ें गे. बिलकुल उसी भाव के लिए जो मैथिलि भाषा की वंदना आप ने सुनाई... हे प्रभू मै अपने लिए बालक मांगता हुं इसलिए नही कि मेरा वंश बढें बल्कि इस लिए कि मेरे बाद आपकी सेवा के लिए मै आपको अपनी छवि समर्पित कर दुं, ताकि अपनी अंतिम सांसे चैन से ले सकुं, आपकी चिंता भी उचित और समाधान भी उचित..बधाई...

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

क्या ये हमारा परम कर्तव्य नही कि हम उसके संस्कारों की नीव वही से रख दें,हर इंसान की ये ख्वाहिश जरुर होती है कि वो अगर अच्छा है तो उसकी संतान को लोग उससे भी अच्छा कहें, और वो हर सफलता का आयाम उससे एक कदम आगे जरूर स्थापित करे,ये बात तो तय है कि अकादमिक क्षेत्र में उसकी मानसिक क्षमता का निर्धारण कर पाना हमारे लिए मुश्किल है,पर ये तो हम कर ही सकते है कि भले ही वो कक्षा में प्रथम स्थान ना बना पाए,लोगों के दिलों में उसका स्थान जरूर प्रथम हो,प्रतिष्ठित पद पर आसीन हो पैसा भले ही भरपुर ना कमा पाए,समाज प्रदत इज्जत से उसकी तिजोरी अवश्य परिपुर्ण रहें,युग भले ना जीत सकें अपने आचरण और सदगुणों से सबका दिल जरूर जीत लें,रिश्तों से जुङे और जोङे,हमारे दर्द ,हमारे संघर्षों को महसुस कर सके,प्रेम को दिल जोङने और सुरक्षा आदान प्रदान करने का विषय बनाए,और आजादी की हवा में विवेक ,धैर्य और आत्मसंबल को अपना कवच बनाए- क्या ऐसी ही सोच नही रखते हम अपने प्रतिरूप के लिए. आदरणीया मीनू जी. सादर अभिवादन क्या बात , वाह क्या बात . वाह ........ बात. जरूर . बधाई.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: Rakesh Rakesh

आदरणीय मीनू जी .... सादर अभिवादन उस लड़की कम औरत में अपनी अधूरी रह गई शादियों को पूर्णता देने की सनक सवार हो गई है .... ऐसा लग रहा है की इस तरह के फैसले के पीछे उस लड़के का बड़ा हाथ लगता है ..... पुरुष वैसे भी किसी दूसरे की औलाद को पालने में खुद को सहज महसूस नहीं करता + अपना नाम देना चाहता ..... बाकि यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही समाहित है की वोह उस लड़की से सच्चा प्यार करता है की नहीं ? लेकिन यह बात भी गोरतलब है की वोह राजी खुशी से उससे तीसरी शादी करने जा रहा है ..... इसलिए मैं इसमें सिर्फ सारा बुरा ही नहीं देख रहा ..... मेरे एक दोस्त की सौतेली मां खुद अपने दूध मुन्हे बच्चे को अपनी वर्द्ध विधवा मां के पास पालन पोषण के लिए छोड़ कर आई थी भगवान ही जानता है की उस बूढी दादी ने किस प्रकार उसको दूध पीला कर पाला होगा .... हम सभी मोहल्ले वाले भी उसको निर्दयी माता मानते थे और उससे दूर रहते थे लेकिन समय के बीतते -२ यह जगजाहिर हो ही गया की उसके सिने में एक नहीं बल्कि दो दिल धड़कते है एक अपनी वर्तमान औलाद के लिए तो दूसरा अपने पज्ले पति से उत्पन्न बेटे लक्की के लिए भगवान आपकी सभी आशंकाये निर्मूल साबित करे इसी कामना के साथ मुबारकबाद सहित

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज" डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: minujha minujha

आदरणीय मीनू जी ......सादर अभिवादन ! मैं अपनी उन मौसी जी के पास तीसरी कक्षा तक पढ़ा हूँ .... उन्होंने एक साल में मुझको फर्स्ट डिविसन में दो क्लासो में पास करवाया था ..... स्कूल में बड़ी ही सख्ती से वोह मुझको बिना किसी लिहाज के मार -२ कर पढ़ाती और सिखलाती थी लेकिन स्कूल कि छुटटी के बाद घर पर आकर टाफियों वगैरह से ढेर सारा प्यार भी करती थी ...... यह मुझको याद नहीं –बताया गया है ..... इसी के फलस्वरूप (दूसरे शहर में )पांचवी कक्षा में यह हालत हो गई कि तूफानी मोसम होने पर माता जी के मना करने पर भी जिद्द करके स्कूल जाता था ....(यह मुझको याद है ) आपका आभारी :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय रक्ताले जी नमस्कार मेरी असहमति आपके विचारों से नही है,कृपया मेरी प्रतिक्रिया एक बार फिर पढें, ……,विवाह तो हो ही जाएगा-इस सोच से मैं पुर्णतया असहमत हुं मैने यहॉ आजकल की सोच के बारे में कहा है,नाकि आपकी सोच के बारे में,कृपया इसे अन्यथा ना लें आपकी ही तरह मेरा भी यही सोचना है कि विवाह अत्यावश्यक है,वो भी सही उम्र पर,करियर उस उम्र तक बन जाए तो अच्छी बात नही भी बने तो विवाह हो जाना ही चाहिए मेरा मकसद कही से आपकी बात को काटना नही था आपके इस बात को मै उस दृष्टिकोण से नही समझ पाई थी जो आपने कहा प्रतिक्रिया में कि विवाह के बाद ही जीवन है,वैसे भी मैं यहां अपने आलेख में ये बात कि विवाह के बाद भी जीवन है   एक संदेश के रूप में उन  लोगो तक पहुंचाना चाहती थी जो विवाह की महत्ता को नही समझते अगर किसी बात से ठेस पहुंची हो तो क्षमाप्रार्थी हुं।

के द्वारा: minujha minujha

मीनू जी नमस्कार, मै अपनी प्रतिक्रया पर किसी तकनिकी खराबी के कारण दुबारा प्रतिक्रया नहीं दे पा रहा हूँ इसलिए अलग से प्रतिक्रया दे रहा हूँ. मैंने आपकी असहमति के कारण आपके आलेख को पुनः पढ़ा. किन्तु मै समझ नहीं पाया की आप मेरी किस बात पर असहमत हैं. मैंने ना तो ये कहा है की विवाह हो ही जाएगा ना ही मैंने ये कहा है की कैरियर को महत्व ना दिया जाए.मैंने माता पिता के मन की बात उजागर की है, क्योंकि प्रत्येक माता पिता को बच्ची के कैरियर के साथ ही विवाह की भी चिंता रहती है.सिर्फ कैरियर बनाने के चक्कर में बालों में सफेदी नहीं पड़ने दी जा सकती यदि आप ऐसा सोचती हैं तो आप यथार्थ से दूर जा रही हैं. आजकल सभी जानते हैं की लड़का और लड़की समानता से पढ़ाई और नौकरी दोनों कर रहे हैं. इसीलिए आजकल लड़की की शादी की उम्र वैसे ही कुछ वर्ष आगे खिसक गयी है. दूसरा आप कह रही हैं शादी के बाद भी एक जीवन है जबकि मेरा मानना है की शादी के बाद ही जीवन है. क्योंकि माता पिता के घर में जो आजादी है.वह ससुराल वाले चाह कर भी नहीं दे सकते, लाख वे पुत्रवधू को पुत्री का दर्जा दे अपनी पुत्री के सामान प्रेम करें किन्तु आसान नहीं है ससुराल में घर जैसी स्वतंत्रता. हाँ एक अच्छा पति मिल जाए तो जीवन भर के लिए एक बहुत अच्छा दोस्त मिलने जैसा है.इसीलिए मेरा मानना है की जीवन तो शादी के बाद ही है क्योंकि वहीँ लड़की की परीक्षा होना है और उसे जीवन के यथार्थ से भेंट करना है.धन्यवाद

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: minujha minujha

के द्वारा: Yashpal Singh Advocate Yashpal Singh Advocate